भगवान शिव और भस्मासुर की कथा
भगवान शिव और भस्मासुर की कथा: कैसे शिव जी अपने ही वरदान से संकट में पड़े (Shrimad Bhagavatam प्रमाण सहित)
श्रीमद् भागवत पुराण (स्कंध 10, अध्याय 88) में भगवान शिव और भस्मासुर की एक प्रसिद्ध कथा वर्णित है। यह कथा भक्ति, अहंकार और विवेक के अभाव से उत्पन्न विनाश का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है।
भस्मासुर का परिचय
भस्मासुर, जिसे कुछ ग्रंथों में वृकासुर भी कहा गया है, एक शक्तिशाली असुर था। वह अत्यंत महत्वाकांक्षी था और अपार शक्ति प्राप्त करना चाहता था। उसे यह विश्वास था कि यदि वह अमर या अजेय हो गया, तो सम्पूर्ण संसार पर उसका अधिकार हो जाएगा।
नारद जी से परामर्श
अपनी इच्छा पूर्ण करने के लिए भस्मासुर ने देवर्षि नारद से पूछा कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव में से कौन शीघ्र प्रसन्न होता है और वरदान देने में विलंब नहीं करता। नारद जी ने उसे बताया कि भगवान शिव सरल स्वभाव के हैं और शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिए उन्हें प्रसन्न करना अपेक्षाकृत सरल है।
कठोर तपस्या और वरदान
नारद जी की प्रेरणा से भस्मासुर ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या आरंभ की। उसने केदारनाथ क्षेत्र में घोर तप किया और अपनी भक्ति प्रदर्शित करने के लिए यज्ञ में अपने शरीर का मांस तक अर्पित कर दिया।
उसकी इस कठोर तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उसके समक्ष प्रकट होकर वरदान माँगने को कहा।
भस्मासुर का भयावह वर
भस्मासुर ने वर माँगा कि वह जिसके सिर पर अपने दाहिने हाथ को रख दे, वह उसी क्षण भस्म हो जाए। भगवान शिव ने अपनी भोले स्वभाववश और वचनबद्धता के कारण यह वरदान दे दिया।
वर का दुरुपयोग और संकट
वर प्राप्त करते ही भस्मासुर का अहंकार बढ़ गया। कुछ कथाओं के अनुसार, उसने पार्वती को प्राप्त करने की इच्छा से और कुछ के अनुसार शक्ति की परीक्षा के लिए, उसी वर का प्रयोग भगवान शिव पर करने का निश्चय किया।
जब भस्मासुर भगवान शिव की ओर अपना हाथ बढ़ाने लगा, तब भगवान शिव संकट में पड़ गए और वहाँ से प्रस्थान कर गए। भस्मासुर उनका पीछा करने लगा।
भगवान विष्णु की शरण
भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव भगवान विष्णु के पास पहुँचे और सहायता की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए एक उपाय सोचा।
मोहिनी रूप और नृत्य
भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण किया। मोहिनी को देखकर भस्मासुर मोहित हो गया और भगवान शिव का पीछा करना भूल गया।
मोहिनी ने भस्मासुर से कहा कि यदि वह नृत्य में उसकी बराबरी कर सके, तो वह उससे विवाह करेगी। भस्मासुर उसकी शर्त मान गया।
नृत्य के दौरान मोहिनी ने अनेक मुद्राएँ दिखाईं। अंत में उसने अपने हाथ को अपने सिर पर रख लिया। मोह में डूबा भस्मासुर भी बिना सोचे-समझे उसी क्रिया का अनुकरण कर बैठा।
भस्मासुर का अंत
जैसे ही भस्मासुर ने अपने सिर पर हाथ रखा, उसका ही वर सक्रिय हो गया और वह तुरंत भस्म हो गया। इस प्रकार उसका अंत हो गया।
भस्मासुर की कथा और भगवान शिव की नश्वरता
भूमिका
श्रीमद् भागवत पुराण (स्कंध 10, अध्याय 88) में वर्णित भस्मासुर (वृकासुर) की कथा को प्रायः एक नैतिक रूपक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु यदि इस कथा का गहन और तर्कपूर्ण अध्ययन किया जाए, तो यह केवल अहंकार और विवेकहीन शक्ति की कथा नहीं रहती, बल्कि यह भगवान शिव की सीमाओं और उनकी अमरता के दावे पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करती है।
यह कथा स्पष्ट संकेत देती है कि भगवान शिव सर्वशक्तिमान, अविनाशी या अमर परमेश्वर नहीं हैं, बल्कि एक शक्तिशाली देवता होते हुए भी संभावित विनाश के अधीन हैं।
भस्मासुर और वरदान: विवेक का अभाव
श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार, भस्मासुर ने घोर तपस्या द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न किया। शिव को भोलेनाथ कहा गया है क्योंकि वे शीघ्र प्रसन्न होकर वरदान दे देते हैं।
भस्मासुर ने वर माँगा कि वह जिसके सिर पर अपना हाथ रख दे, वह तत्काल भस्म हो जाए। भगवान शिव ने यह वरदान दे दिया।
यहीं से एक मूल प्रश्न उत्पन्न होता है:
यदि भगवान शिव सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होते, तो क्या वे इस वरदान के परिणाम नहीं समझते?
वरदान देना यह दर्शाता है कि शिव वचनबद्ध तो हैं, परंतु सर्वज्ञ नहीं।
शिव पर ही संकट: अमरता का खंडन
वरदान प्राप्त करते ही भस्मासुर ने उसी शक्ति का प्रयोग भगवान शिव पर करने का निश्चय किया। यह स्थिति अत्यंत निर्णायक है।
शिव:
- न तो वरदान को निरस्त करते हैं
- न ही भस्मासुर को तुरंत नष्ट करते हैं
- न ही उस शक्ति से अप्रभावित रहते हैं
इसके विपरीत, भगवान शिव वहाँ से भागते हैं।
भागना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि:
- शिव विनाश की संभावना से मुक्त नहीं हैं
- वे भय और संकट से परे नहीं हैं
यदि शिव अमर होते, तो भस्मासुर का वर उन पर लागू ही नहीं होता।
विष्णु की शरण: निर्भरता का प्रमाण
भागवत पुराण स्पष्ट करता है कि भगवान शिव अंततः भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जो स्वयं अमर और सर्वोच्च हो, उसे किसी अन्य सत्ता की शरण लेने की आवश्यकता नहीं होती।
यहाँ:
- समस्या का समाधान शिव नहीं करते
- संकट का अंत शिव नहीं करते
- भस्मासुर का वध शिव नहीं करते
समाधान विष्णु द्वारा किया जाता है।
मोहिनी लीला: शिव की असहायता
भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर को मोहित करते हैं और उसे नृत्य में स्वयं अपने सिर पर हाथ रखने के लिए प्रेरित करते हैं। उसी क्षण भस्मासुर स्वयं भस्म हो जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम में:
- शिव केवल दर्शक हैं
- उनकी रक्षा किसी अन्य द्वारा होती है
यह सिद्ध करता है कि शिव स्वयं अपनी रक्षा करने में असमर्थ थे।
शास्त्रीय निष्कर्ष
श्रीमद् भागवत पुराण (10.88) की यह कथा स्पष्ट रूप से निम्न तथ्य स्थापित करती है:
- भगवान शिव वरदान के दुरुपयोग से संकट में पड़ सकते हैं
- वे विनाश के भय से भाग सकते हैं
- उन्हें किसी अन्य सत्ता की सहायता की आवश्यकता पड़ती है
- वे सर्वशक्तिमान या अविनाशी नहीं हैं
अतः यह कथा भगवान शिव की अमरता का समर्थन नहीं करती, बल्कि उनके नश्वर और सीमित देवता होने का संकेत देती है।
उपसंहार
भस्मासुर की कथा केवल असुर के अहंकार का विनाश नहीं है, बल्कि यह एक गहन दार्शनिक सन्देश भी देती है—कि जो सत्ता खुद नष्ट हो सकने की स्थिति में हो, वह पूर्ण परमेश्वर नहीं हो सकती।
श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार भगवान शिव अत्यंत पूज्य, शक्तिशाली और आदरणीय देवता हैं, किंतु वे अमर, अविनाशी और सर्वोच्च परमेश्वर नहीं हैं।
सच्चे परमेश्वर की पहचान केवल भक्ति से नहीं, बल्कि शास्त्रों के समन्वित और तर्कपूर्ण अध्ययन से ही संभव है।
इस कथा से श्रीमद देवी भगवत का कथन सत्य सिद्ध होता है जिसमे ये बताया गया है की ब्रह्मा, विष्णु और शिव का जनम तथा मृत्यु होती है। ये देवता नाशवान हैं।