अध्याय 10 श्लोक 11

तेषाम्, एव, अनुकम्पार्थम्, अहम्, अज्ञानजम्, तमः,
नाशयामि, आत्मभावस्थः, ज्ञानदीपेन, भास्वता ।।11।।

अनुवाद: (अहम्) मैं (एव) ही (तेषाम्) उनके ऊपर (अनुकम्पार्थम्) कृप्या करनेके लिये (अज्ञानजम्) अज्ञानसे उत्पन्न (तमः) अन्धकारको (नाशयामि) नष्ट करता हूँ। (आत्मभावस्थः) प्रेतवत् प्रवेश करके आत्मा की तरह शरीर में स्थापित होकर जैसे जीवात्मा बोलती है। उसी भाव से अर्थात् आत्म भाव से आत्मा में स्थित होकर (ज्ञानदीपेन) ज्ञानरूप दीपक (भास्वता) प्रकाशमय करता हूँ। (11)

हिन्दी: मैं ही उनके ऊपर कृप्या करनेके लिये अज्ञानसे उत्पन्न अन्धकारको नष्ट करता हूँ। प्रेतवत् प्रवेश करके आत्मा की तरह शरीर में स्थापित होकर जैसे जीवात्मा बोलती है। उसी भाव से अर्थात् आत्म भाव से आत्मा में स्थित होकर ज्ञानरूप दीपक प्रकाशमय करता हूँ।