अध्याय 6 श्लोक 10

(श्लोक 10 से 15 में ब्रह्म ने अपनी पूजा के ज्ञान की अटकल लगाई है)

योगी, युञ्जीत, सततम्, आत्मानम्, रहसि, स्थितः,
एकाकी, यतचित्तात्मा, निराशीः, अपरिग्रहः ।।10।।

अनुवाद: (यतचित्तात्मा) मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें रखनेवाला (निराशीः) आशारहित और (अपरिग्रहः) संग्रहरहित (योगी) साधक (एकाकी) अकेला ही (रहसि) एकान्त स्थानमें रहता है तथा (स्थितः) स्थित होकर (आत्मानम्) आत्माको (सतत्म) निरन्तर परमात्मामें (युञ्जीत) लगावे। (10)

हिन्दी: मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें रखनेवाला आशारहित और संग्रहरहित साधक अकेला ही एकान्त स्थानमें रहता है तथा स्थित होकर आत्माको निरन्तर परमात्मामें लगावे।