अध्याय 14 श्लोक 25
मानापमानयोः, तुल्यः, तुल्यः, मित्ररिपक्षयोः,
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः, सः, उच्यते ।।25।।
अनुवाद: (मानापमानयोः) जो मान और अपमानमें (तुल्यः) सम है (मित्ररिपक्षयोः) मित्र और वैरीके पक्षमें भी (तुल्यः) सम है एवं (सर्वारम्भपरित्यागी)राग वश किसी का लाभ करने वाले तथा द्वेष वश किसी को हानि करने वाले सम्पूर्ण आरम्भों का त्यागी है (सः) वह भक्त (गुणातीतः) तीनों भगवानों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तम् गुण शिव जी की निराकार शक्ति से प्रभावित नहीं होता वह) गुणातीत (उच्यते) कहा जाता है। (25)
हिन्दी: जो मान और अपमानमें सम है मित्र और वैरीके पक्षमें भी सम है एवं राग वश किसी का लाभ करने वाले तथा द्वेष वश किसी को हानि करने वाले सम्पूर्ण आरम्भों का त्यागी है वह भक्त तीनों भगवानों गुणातीत कहा जाता है।