अध्याय 18 श्लोक 49

असक्तबुद्धिः, सर्वत्र, जितात्मा, विगतस्पृहः,
नैष्कम्र्यसिद्धिम्, परमाम्, सóयासेन, अधिगच्छति ।।49।।

अनुवाद: (सर्वत्र) सर्वत्र (असक्तबुद्धिः) आसक्तिरहित बुद्धिवाला (विगतस्पृृहः) स्पृहारहित और (जितात्मा) बुरे कर्मों से विजय प्राप्त भक्त आत्मा (सóयासेन) तत्व ज्ञान के अतिरिक्त सर्व ज्ञनों से सन्यास प्राप्त करने वाले द्वारा (परमाम्) उस परम अर्थात् सर्व श्रेष्ठ (नैष्कम्र्यसिद्धिम्) पूर्ण पाप विनाश होने पर जो पूर्ण मुक्ति होती है, उस सिद्धि अर्थात् परमगति को (अधिगच्छति) प्राप्त होता है। (49)

हिन्दी: सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला स्पृहारहित और बुरे कर्मों से विजय प्राप्त भक्त आत्मा तत्व ज्ञान के अतिरिक्त सर्व ज्ञनों से सन्यास प्राप्त करने वाले द्वारा उस परम अर्थात् सर्व श्रेष्ठ पूर्ण पाप विनाश होने पर जो पूर्ण मुक्ति होती है, उस सिद्धि अर्थात् परमगति को प्राप्त होता है।