अध्याय 4 श्लोक 6
अजः, अपि, सन्, अव्ययात्मा, भूतानाम्, ईश्वरः, अपि, सन्,
प्रकृतिम्, स्वाम्, अधिष्ठाय, सम्भवामि, आत्ममायया ।।6।।
अनुवाद: (अजः) मनुष्यों की तरह मैं जन्म न लेने वाला और (अव्ययात्मा) अविनाशीआत्मा (सन्) होते हुए (अपि) भी तथा (भूतानाम्) मेरे इक्कीस ब्रह्मण्डों के प्राणियोंका (ईश्वरः) ईश्वर (सन्) होते हुए (अपि) भी (स्वाम्) अपनी (प्रकृतिम्) प्रकृृति अर्थात् दुर्गा को (अधिष्ठाय) अधीन करके अर्थात् पत्नी रूप में रखकर (आत्ममायया) अपने अंश अर्थात् पुत्र श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, व शिव जी उत्पन्न करता हूँ, फिर उन्हें श्री कृष्ण, श्री राम, श्री परसुराम आदि अंश अवतार (सम्भवामि) प्रकट करता हूँ। (6)
हिन्दी: मनुष्यों की तरह मैं जन्म न लेने वाला और अविनाशीआत्मा होते हुए भी तथा मेरे इक्कीस ब्रह्मण्डों के प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृृति अर्थात् दुर्गा को अधीन करके अर्थात् पत्नी रूप में रखकर अपने अंश अर्थात् पुत्र श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, व शिव जी उत्पन्न करता हूँ, फिर उन्हें श्री कृष्ण, श्री राम, श्री परसुराम आदि अंश अवतार प्रकट करता हूँ।