क्या परमेश्वर ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया था
बाइबिलिक सत्य पुनर्विचार – भाग 2
क्या परमेश्वर ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया था?
आहार, अहिंसा और बाइबिल में परमेश्वर की अपरिवर्तनीय इच्छा
भूमिका (भाग 1 से संबंध)
इस श्रृंखला के भाग 1 में — “क्या परमेश्वर साकार है या निराकार?” — हमने केवल बाइबिल के प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया था कि बाइबिल का परमेश्वर कोई अमूर्त शक्ति नहीं, बल्कि साकार, चेतन, बोलने-चलने वाला और प्रकट होने वाला परमेश्वर है।
अब भाग 2 में हम एक स्वाभाविक और गहरा प्रश्न उठाते हैं:
यदि परमेश्वर साकार, नैतिक और चेतन है, तो वह जीवन, हिंसा और भोजन के विषय में क्या आदेश देता है?
परमेश्वर के आहार संबंधी आदेश कोई गौण विषय नहीं हैं। वे उसके नैतिक स्वभाव और सृष्टि की मूल व्यवस्था को प्रकट करते हैं।
यह लेख प्रमाणित करता है कि बाइबिल का परमेश्वर मूलतः अहिंसक और शाकाहारी व्यवस्था स्थापित करता है—जिसे बाद में मानव पतन के कारण केवल नियंत्रित रूप में बदला गया, समाप्त नहीं।
1. सृष्टि का पहला आदेश: पूर्ण शाकाहार
उत्पत्ति 1:29
“और परमेश्वर ने कहा, देखो, मैं ने तुम्हें पृथ्वी पर के सब बीज-वाले पौधे और सब वृक्ष दिए हैं, जिनमें बीज-वाला फल होता है; ये तुम्हारे भोजन के लिये होंगे।”
यह बाइबिल का पहला आहार-नियम है। ध्यान दें:
- केवल पौधे और फल दिए गए
- मांस की कोई अनुमति नहीं
- यह आदेश पाप, मृत्यु और हिंसा से पहले दिया गया
उत्पत्ति 1:30
“और पृथ्वी के सब पशुओं को… हर एक हरे पौधे को भोजन के लिये दिया।”
अर्थात:
- मनुष्य ही नहीं, सभी पशु भी शाकाहारी थे
- न हत्या थी, न रक्तपात
- और परमेश्वर ने इसे “बहुत अच्छा” कहा (उत्पत्ति 1:31)
यही परमेश्वर की मूल और आदर्श व्यवस्था है।
2. परमेश्वर का स्वभाव बदलता नहीं
बाइबिल स्पष्ट कहती है कि परमेश्वर अपरिवर्तनीय है। इसलिए:
- उसकी नैतिक इच्छा समय के साथ नहीं बदलती
- हिंसा कभी धर्म नहीं बन सकती
- बाद में दी गई कोई अनुमति, मूल आदेश को रद्द नहीं करती
उत्पत्ति 1 कोई प्रतीक नहीं, बल्कि सृष्टि का विधान है।
3. उत्पत्ति 9:3 – आदर्श या मजबूरी?
उत्पत्ति 9:3
“जो कुछ चलता-फिरता है, वह तुम्हारे भोजन के लिये होगा।”
यह वचन जलप्रलय के बाद दिया गया, जब पृथ्वी:
- हिंसा से भर चुकी थी (उत्पत्ति 6:11)
- मानव नैतिक रूप से पतित हो चुका था
बाइबिल में परमेश्वर कई बार पतित मनुष्य को नियंत्रित छूट देता है, जैसे:
- तलाक
- राजतंत्र
- दास-प्रथा
उत्पत्ति 9:3 भी ऐसा ही समझौता है, न कि आदर्श।
4. रक्त निषेध: हिंसा फिर भी अपराध है
उत्पत्ति 9:4–5
“परन्तु मांस उसके प्राण अर्थात उसके लोहू समेत न खाना… मैं प्राण के लिये प्राण का लेखा लूँगा।”
यह स्पष्ट करता है:
- रक्त = जीवन
- हत्या के लिए हिसाब देना होगा
- हिंसा कभी सामान्य नहीं है
यदि परमेश्वर हत्या को स्वीकृति देता, तो यह चेतावनी आवश्यक नहीं होती।
5. परमेश्वर का पूर्ण राज्य: बिना हत्या का संसार
यशायाह 11:6–9
यशायाह 65:25
इन भविष्यवाणियों में:
- हिंसक पशु भी शाकाहारी हो जाते हैं
- न मार है, न भय
- सम्पूर्ण सृष्टि में शांति
यह कोई पीछे जाना नहीं, बल्कि मूल व्यवस्था की पुनर्स्थापना है।
जो अंत में पुनः स्थापित होता है, वही परमेश्वर की सच्ची इच्छा होती है।
6. परमेश्वर रक्तबलि से भी घृणा करता है
यशायाह 66:3
“जो बैल बलि करता है, वह मानो मनुष्य की हत्या करता है।”
यह वचन स्पष्ट करता है:
- पशु-हत्या = मनुष्य-हत्या
- धार्मिक बहाने से भी हिंसा स्वीकार्य नहीं
यह उन सभी दावों को समाप्त कर देता है कि परमेश्वर रक्तपात से प्रसन्न होता है।
7. दानिय्येल: व्यवहारिक प्रमाण
दानिय्येल 1:12–15
दानिय्येल ने:
- शाक भोजन और जल चुना
- राजकीय मांसाहार त्यागा
परिणाम:
- श्रेष्ठ स्वास्थ्य
- ईश्वरीय कृपा
- नैतिक श्रेष्ठता
यह सिद्धांत नहीं, प्रत्यक्ष प्रमाण है।
8. नीति-वचन: मांस और नैतिक पतन
नीतिवचन 23:20–21
“मांस खाने वालों के संग न रहना…”
बाइबिल में मांस को जोड़ा गया है:
- भोग-विलास
- अति
- आत्मिक जड़ता
कहीं भी सब्जी खाने से सावधान नहीं किया गया।
9. सम्पूर्ण शास्त्रीय प्रवाह (Ethical Trajectory)
- सृष्टि शाकाहारी है
- हिंसा मनुष्य के पतन से आती है
- परमेश्वर हिंसा को सीमित करता है
- रक्तपात की निंदा करता है
- अंत में अहिंसा पुनः स्थापित करता है
यह प्रवाह स्पष्ट और अटूट है।
परिशिष्ट: वाद-विवाद-अडिग प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: परमेश्वर ने मांस की अनुमति दी, तो वह सही है उत्तर: अनुमति समर्थन नहीं होती। तलाक भी अनुमति है, आदर्श नहीं।
प्रश्न 2: यीशु ने मछली खाई उत्तर: यह लेख परमेश्वर की मूल और अंतिम व्यवस्था पर है, न कि पतित संसार में जीवित रहने की मजबूरी पर।
प्रश्न 3: पशु खाने के लिए बनाए गए उत्तर: उत्पत्ति 1:29–30 इसका खंडन करता है।
प्रश्न 4: मांस शक्ति देता है उत्तर: दानिय्येल 1 इसका शास्त्रीय खंडन है।
प्रश्न 5: यशायाह प्रतीकात्मक है उत्तर: यदि शांति प्रतीक है, तो न्याय भी प्रतीक मानना पड़ेगा—जो असंगत है।
निष्कर्ष
बाइबिल का परमेश्वर:
- बिना हिंसा सृष्टि करता है
- शाकाहार का आदेश देता है
- रक्तपात से घृणा करता है
- पतित मनुष्य को नियंत्रित छूट देता है
- अंत में अहिंसा पुनः स्थापित करता है
शाकाहार कोई आधुनिक विचार नहीं, बल्कि परमेश्वर की मूल और अंतिम इच्छा है।