अध्याय 5 श्लोक 12
युक्तः, कर्मफलम्, त्यक्त्वा, शान्तिम्, आप्नोति, नैष्ठिकीम्,
अयुक्तः, कामकारेण, फले, सक्तः, निबध्यते ।।12।।
अनुवाद: (युक्तः) शास्त्रानुकूल सत्य साधना में लगा भक्त (कर्मफलम्) कर्मोंके फलका (त्यक्त्वा) त्याग करके (नैष्ठिकीम्) स्थाई अर्थात् परम (शान्तिम्) शान्तिको (आप्नोति) प्राप्त होता है और (अयुक्तः) शास्त्र विधि रहित साधना करने वाला अर्थात् असाध (कामकारेण) मनो कामना की पूर्ति के लिए (फले) फलमें (सक्तः) आसक्त होकर (निबध्यते) पाप कर्म के कारण बँधता है। (12)
हिन्दी: शास्त्रानुकूल सत्य साधना में लगा भक्त कर्मोंके फलका त्याग करके स्थाई अर्थात् परम शान्तिको प्राप्त होता है और शास्त्र विधि रहित साधना करने वाला अर्थात् असाध मनो कामना की पूर्ति के लिए फलमें आसक्त होकर पाप कर्म के कारण बँधता है।