अध्याय 14 श्लोक 6

तत्र, सत्त्वम्, निर्मलत्वात्, प्रकाशकम्, अनामयम्,
सुखसंगेन, बध्नाति, ज्ञानसंगेन, च, अनघ ।।6।।

अनुवाद: (अनघ) हे निष्पाप! (तत्र) उन तीनों गुणोंमें (सत्त्वम्) सत्वगुण तो (निर्मलत्वात्) निर्मल होनेके कारण (प्रकाशकम्) प्रकाश करनेवाला और (अनामयम्) नकली अनामी है वह (सुखसंगेन) सुखके सम्बन्धसे (च) और (ज्ञानसंगेन) ज्ञानके सम्बन्धसे अर्थात् उसके अभिमानसे (बध्नाति) बाँधता है। (6)

हिन्दी: हे निष्पाप! उन तीनों गुणोंमें सत्वगुण तो निर्मल होनेके कारण प्रकाश करनेवाला और नकली अनामी है वह सुखके सम्बन्धसे और ज्ञानके सम्बन्धसे अर्थात् उसके अभिमानसे बाँधता है।