अध्याय 2 श्लोक 50

बुद्धियुक्तः, जहाति, इह, उभे, सुकृतदुष्कृते,
तस्मात् योगाय, युज्यस्व, योगः, कर्मसु, कौशलम् ।।50।।

अनुवाद: (बुद्धियुक्तः) समबुद्धियुक्त अर्थात् तत्वदर्शी संत द्वारा बताया वास्तविक एक रूप शास्त्र अनुकूल भक्ति मार्ग पर लगा साधक पुरुष (सुकृतदुष्कृते) अच्छे कर्म जैसे मनमानी पूजाऐं जो सुकृत मान कर कर रहा था या मेरे बताए मार्ग अनुसार ओम् का जाप व यज्ञ आदि पुण्य करता था उस पुण्य को तथा बुरे कर्म जैसे मांस-मदिरा-तम्बाखु आदि नशीली वस्तुओं के सेवन रूपी दुष्कर्म पाप इन (उभे) दोनोंको (इह)इसी लोक में अर्थात् काल लोक में (जहाति) त्याग देता है अर्थात् जैसे पूर्ण संत कहता है वैसे ही करता है (तस्मात्) इसलिए तू (योगाय) शास्त्र विधि अनुसार साधना अर्थात् समत्वरूप योगमें (युज्यस्व) लग जा यह (योगः) तत्वदर्शी संत द्वारा बताया भक्ति मार्ग ही (कर्मसु) भक्ति कर्मों में (कौशलम्) कुशलता है अर्थात् बुद्धिमत्ता है। (50)

हिन्दी: समबुद्धियुक्त अर्थात् तत्वदर्शी संत द्वारा बताया वास्तविक एक रूप शास्त्र अनुकूल भक्ति मार्ग पर लगा साधक पुरुष अच्छे कर्म जैसे मनमानी पूजाऐं जो सुकृत मान कर कर रहा था या मेरे बताए मार्ग अनुसार ओम् का जाप व यज्ञ आदि पुण्य करता था उस पुण्य को तथा बुरे कर्म जैसे मांस-मदिरा-तम्बाखु आदि नशीली वस्तुओं के सेवन रूपी दुष्कर्म पाप इन दोनोंको इसी लोक में अर्थात् काल लोक में त्याग देता है अर्थात् जैसे पूर्ण संत कहता है वैसे ही करता है इसलिए तू शास्त्र विधि अनुसार साधना अर्थात् समत्वरूप योगमें लग जा यह तत्वदर्शी संत द्वारा बताया भक्ति मार्ग ही भक्ति कर्मों में कुशलता है अर्थात् बुद्धिमत्ता है।

यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में है जिसमें कहा है कि मेरी सर्व धार्मिक पूजाओं को मेरे में त्याग कर उस पूर्ण परमात्मा की शरण में जा तब मैं तुझे सर्व पापों से मुक्त कर दूंगा।