अध्याय 3 श्लोक 5

न, हि, कश्चित्, क्षणम्, अपि, जातु, तिष्ठति, अकर्मकृत्,
कार्यते, हि, अवशः, कर्म, सर्वः, प्रकृतिजैः, गुणैः ।।5।।

अनुवाद: (हि) निःसन्देह (कश्चित्) कोई भी मनुष्य (जातु) किसी भी कालमें (क्षणम्) क्षणमात्र (अपि) भी (अकर्मकृृत्) बिना कर्म किये (न) नहीं (तिष्ठति) रहता (हि) क्योंकि (सर्वः) सारा मनुष्य समुदाय (प्रकृतिजैः) प्रकृति अर्थात् दुर्गा जनित (गुणैः) रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव जी गुणोंद्वारा (अवशः) परवश हुआ (कर्म) कर्म करनेके लिये (कार्यते) बाध्य किया जाता है। (5)

हिन्दी: निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी कालमें क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति अर्थात् दुर्गा जनित रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव जी गुणोंद्वारा परवश हुआ कर्म करनेके लिये बाध्य किया जाता है।

(इसी का प्रमाण अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में भी है।)