अध्याय 4 श्लोक 28
द्रव्ययज्ञाः, तपोयज्ञाः, योगयज्ञाः, तथा, अपरे,
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः, च, यतयः, संशितव्रताः ।।28।।
अनुवाद: (अपरे) कई साधक (द्रव्ययज्ञाः) द्रव्य-सम्बन्धी धार्मिक कर्म केवल दान करनेवाले हैं कितने ही (तपोयज्ञाः) तपस्यारूप धार्मिक कर्म करनेवाले हैं (तथा) तथा दूसरे कितने ही (योगयज्ञाः) योगासन रूप धार्मिक कर्म करनेवाले हैं (च) और कितने ही (संशितव्रताः) घोर व्रतोंसे युक्त (यतयः) यत्नशील हैं और (स्वध्यायज्ञानयज्ञाः) कुछ स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ अर्थात् केवल सद्ग्रन्थों का नित्य पाठ करनेवाले हैं अर्थात् इसी को मोक्ष मार्ग मानते हैं। (28)
हिन्दी: कई साधक द्रव्य-सम्बन्धी धार्मिक कर्म केवल दान करनेवाले हैं कितने ही तपस्यारूप धार्मिक कर्म करनेवाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगासन रूप धार्मिक कर्म करनेवाले हैं और कितने ही घोर व्रतोंसे युक्त यत्नशील हैं और कुछ स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ अर्थात् केवल सद्ग्रन्थों का नित्य पाठ करनेवाले हैं अर्थात् इसी को मोक्ष मार्ग मानते हैं।