अध्याय 9 श्लोक 5

न, च, मत्स्थानि, भूतानि, पश्य, मे, योगम्, ऐश्वरम्, भूतभृत्, न, च, भूतस्थः, मम, आत्मा, भूतभावनः ।।5।।

अनुवाद: (च) और (भूतानि) सब प्राणी (मे) मेरे में (मत्स्थानि) स्थित (न) नहीं हैं (च) और (न) न ही (मम) मेरी (आत्मा) आत्मा (भूतभावनः) जीव उत्पन्न करने वाला (पश्य) जान वह (ऐश्वरम्) परम शक्ति युक्त पूर्ण परमात्मा (भूतभृत्) प्राणियों का धारण पोषण करने वाला (योगम्) अभेद सम्बन्ध शक्तिसे (भूतस्थः) प्राणियों में स्थित है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में भी है कि पूर्ण परमात्मा कोई और है, वह सर्व जगत का पालन-पोषण करता है। यही प्रमाण गीता अध्याय 13 श्लोक 17 अध्याय 18 श्लोक 61 में है कहा है कि पूर्ण परमात्मा सर्व प्राणियों के हृदय में विशेष रूप से स्थित है। वह पूर्ण परमात्मा अपनी शक्ति से सर्व प्राणियों को यन्त्र की तरह भ्रमण कराता है। (5)

हिन्दी: और सब प्राणी मेरे में स्थित नहीं हैं और न ही मेरी आत्मा जीव उत्पन्न करने वाला जान वह परम शक्ति युक्त पूर्ण परमात्मा प्राणियों का धारण पोषण करने वाला अभेद सम्बन्ध शक्तिसे प्राणियों में स्थित है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में भी है कि पूर्ण परमात्मा कोई और है, वह सर्व जगत का पालन-पोषण करता है। यही प्रमाण गीता अध्याय 13 श्लोक 17 अध्याय 18 श्लोक 61 में है कहा है कि पूर्ण परमात्मा सर्व प्राणियों के हृदय में विशेष रूप से स्थित है। वह पूर्ण परमात्मा अपनी शक्ति से सर्व प्राणियों को यन्त्र की तरह भ्रमण कराता है।