अध्याय 14 श्लोक 20
गुणान्, एतान्, अतीत्य, त्रीन, देही, देहसमुद्भवान्,
जन्ममृत्युजरादुःखै, विमुक्तः, अमृृतम्, अश्नुते ।।20।।
अनुवाद: वह (देही) जीवात्मा (देहसमुद्भवान्) शरीरकी उत्पत्तिके कारणरूप (एतान्) इन (त्रीन) तीनों (गुणान्) गुणों अर्थात् तीनों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी का(अतीत्य) उल्लंघन करके तथा पूर्ण परमात्मा की शास्त्र विधि अनुसार पूजा करके (जन्ममृत्युजरा दुःखैः) जन्म, मृृत्यु, वृृद्धावस्था और सब प्रकारके दुःखोंसे (विमुक्तः) मुक्त हुआ (अमृृतम्) परमानन्दको अर्थात् पूर्ण मुक्त होकर अमरत्व को (अश्नुते) प्राप्त होता है। (20)
हिन्दी: वह जीवात्मा शरीरकी उत्पत्तिके कारणरूप इन तीनों गुणों अर्थात् तीनों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी का उल्लंघन करके तथा पूर्ण परमात्मा की शास्त्र विधि अनुसार पूजा करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हुआ परमानन्दको अर्थात् पूर्ण मुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त होता है।