अध्याय 4 श्लोक 20

त्यक्त्वा, कर्मफलासंगम्, नित्यतृप्तः, निराश्रयः,
कर्मणि, अभिप्रवृत्तः, अपि, न, एव, किंचित्, करोति, सः ।।20।।

अनुवाद: (कर्मफलासंगम्) तत्वज्ञान के आधार से शास्त्र विधि रहित कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्ति का सर्वथा (त्यक्त्वा) त्याग करके (निराश्रयः) शास्त्र विधि रहित भक्ति के कर्म से रहित हो गया है और (नित्यतृृप्तः) शास्त्र अनुकूल साधना के कर्मों से नित्य तृप्त है (सः) वह (कर्मणि) संसारिक व शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्मोंमें (अभिप्रवृत्त) भलीभाँति बरतता हुआ (अपि) भी (एव) वास्तवमें (किंचित्) कुछ भी शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमानी पूजा तथा दोषयुक्त कर्म (न) नहीं (करोति) करता। (20)

हिन्दी: तत्वज्ञान के आधार से शास्त्र विधि रहित कर्मोंमं और उनके फलमें आसक्ति का सर्वथा त्याग करके शास्त्र विधि रहित भक्ति के कर्म से रहित हो गया है और शास्त्र अनुकूल साधना के कर्मों से नित्य तृप्त है वह संसारिक व शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्मोंमें भलीभाँति बरतता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमानी पूजा तथा दोषयुक्त कर्म नहीं करता।