अध्याय 6 श्लोक 2

यम्, सन्यासम्, इति, प्राहुः, योगम्, तम्, विद्धि पाण्डव,
न, हि, असन्यस्तसङ्कल्पः, योगी, भवति, कश्चन ।।2।।

अनुवाद: (पाण्डव) हे अर्जुन! (यम्) जिसको (सन्यासम्) सन्यास (इति) ऐसा (प्राहुः) कहते हैं (तम्) उस (योगम्) भक्ति ज्ञान योग को (विद्धि) जान (हि) क्योंकि (असन्यस्तसङ्कल्पः) संकल्पोंका त्याग न करनेवाला (कश्चन) कोई भी पुरुष (योगी) योगी (न) नहीं (भवति) होता। (2)

हिन्दी: हे अर्जुन! जिसको सन्यास ऐसा कहते हैं उस भक्ति ज्ञान योग को जान क्योंकि संकल्पोंका त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।

गरीब, एक नारी त्याग दीन्हीं, पाँच नारी गैल बे।
पाया न द्वारा मुक्ति का, सुखदेव करी बहु सैल बे।।

भावार्थ है कि एक पत्नी को त्याग कर सन्यास प्रस्त हो गए परंतु पाँच विकार(काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) रूपी पत्नियाँ साथ ही हैं अर्थात् संकल्प अभी भी रहे, ये त्यागो, तब सन्यासी होवोगे। जैसे सुखदेव जी सन्यासी बन कर बहुत फिरा परंतु मान-बड़ाई नहीं त्यागी जिसके कारण विफल रहा।