अध्याय 2 श्लोक 18

अन्तवन्तः, इमे, देहाः, नित्यस्य, उक्ताः, शरीरिणः,
अनाशिनः, अप्रमेयस्य, तस्मात्, युध्यस्व, भारत ।।18।।

अनुवाद: (इमे) ये (देहाः) पंच भौतिक शरीर (अन्तवन्तः) नाशवान् है (शरीरिणः) अविनाशी परमात्मा जो आत्मा सहित शरीर में नित्य रहता है। (अप्रमेयस्य) साधारण साधक पूर्ण परमात्मा व आत्मा के अभेद सम्बन्ध से अपरिचित है इसलिए प्रमाण रहित को (नित्यस्य) आत्मा के साथ नित्य रहने वाला (अनाशिनः) अविनाशी (उक्ताः) कहा गया हैं। (तस्मात्) इसलिये (भारत) हे भरतवंशी अर्जुन! (युध्यस्व) युद्ध कर। (18)

हिन्दी: ये पंच भौतिक शरीर नाशवान् है अविनाशी परमात्मा जो आत्मा सहित शरीर में नित्य रहता है। साधारण साधक पूर्ण परमात्मा व आत्मा के अभेद सम्बन्ध से अपरिचित है इसलिए प्रमाण रहित को आत्मा के साथ नित्य रहने वाला अविनाशी कहा गया हैं। इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! युद्ध कर।

भावार्थ: परमात्मा की निराकार शक्ति आत्मा के साथ ऐसे जानों जैसे मोबाइल फोन रेंज से ही कार्य करता है। टौवर एक स्थान पर होते हुए भी अपनी रेंज से अपने क्षेत्र वाले मोबाईल फोन के साथ अभेद है। इसको वही समझ सकता है जो मोबाईल फोन रखता है। इसी प्रकार परमात्मा अपने निज स्थान सत्यलोक में रहता है या जहाँ भी आता जाता है अपनी निराकार शक्ति की रेंज को उसी तरह प्रत्येक ब्रह्मण्ड के प्रत्येक प्राणी व स्थान अर्थात् जड़ व चेतन पर फैलाए रहता है। जैसे सूर्य दूर स्थान पर रहते हुए भी अपना प्रकाश व अदृश्य उष्णता (गर्मी) को अपने क्षमता क्षेत्र सर्व ब्रह्मण्ड़ों पर कण-कण में फैलाए रहता है। इसी प्रकार परमात्मा के शरीर से निकल रहा प्रकाश व अदृश्य शक्ति सर्व जड़ व चेतन को संभाले हुए है।