अध्याय 13 श्लोक 20

कार्यकरणकतृर्त्वे, हेतुः, प्रकृतिः, उच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानाम्, भोक्तृृत्वे, हेतुः, उच्यते ।।20।।

अनुवाद: (कार्यकरणकतृत्वे) कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें (हेतुः) हेतु (प्रकृतिः) प्रकृृति (उच्यते) कही जाती है और (पुरुषः) सतपुरुष (सुखदुःखानाम्) सुख-दुःखोंके (भोक्तृत्वे) जीवात्मा को भोग भोगवाने के कारण भोगनेमें (हेतुः) हेतु (उच्यते) कहा जाता है। गीता अध्याय 18 श्लोक 16 में कहा है कि परमेश्वर सर्व प्राणियों को यन्त्र की तरह कर्मानुसार भ्रमण कराता हुआ सर्व प्राणियों के हृदय में स्थित है। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा तो गीता ज्ञान दाता से अन्य है। वही अविनाशी परमात्मा तीनों लोकों में प्रवेश करके सर्व का धारण पोषण करता है। (20)

हिन्दी: कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें हेतु प्रकृति कही जाती है और सतपुरुष सुख-दुःखोंके जीवात्मा को भोग भोगवाने के कारण भोगनेमें हेतु कहा जाता है। गीता अध्याय 18 श्लोक 16 में कहा है कि परमेश्वर सर्व प्राणियों को यन्त्र की तरह कर्मानुसार भ्रमण कराता हुआ सर्व प्राणियों के हृदय में स्थित है। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा तो गीता ज्ञान दाता से अन्य है। वही अविनाशी परमात्मा तीनों लोकों में प्रवेश करके सर्व का धारण पोषण करता है।