अध्याय 4 श्लोक 14
न, माम्, कर्माणि, लिम्पन्ति, न, मे, कर्मफले, स्पृृहा,
इति, माम्, यः, अभिजानाति, कर्मभिः, न, सः, बध्यते ।।14।।
अनुवाद: (कर्मफले) कर्मोंके फलमें (मे) मेरी (स्पृहा) स्पृृहा (न) नहीं है इसलिये (माम्) मुझे (कर्माणि) कर्म (न,लिम्पन्ति) लिप्त नहीं करते (इति) इस प्रकार (यः) जो (माम्) मुझ काल-ब्रह्म को (अभिजानाति) तत्वसे जान लेता है (सः) वह भी (कर्मभिः) कर्मोंसे (न) नहीं (बध्यते) बंधता अर्थात् गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहे तत्वदर्शी संत की खोज करके गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहे उस परमात्मा की शरण में जाकर पूर्ण परमात्मा की भक्ति करके कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाता है। (14)
हिन्दी: कर्मोंके फलमें मेरी स्पृृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते इस प्रकार जो मुझ काल-ब्रह्म को तत्वसे जान लेता है वह भी कर्मोंसे नहीं बंधता अर्थात् गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहे तत्वदर्शी संत की खोज करके गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहे उस परमात्मा की शरण में जाकर पूर्ण परमात्मा की भक्ति करके कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाता है।