अध्याय 17 श्लोक 22

अदेशकाले, यत्, दानम्, अपात्रोभ्यः, च, दीयते,
असत्कृतम्, अवज्ञातम्, तत्, तामसम्, उदाहृतम्।।22।।

अनुवाद: (यत्) जो (दानम्) दान (अवज्ञातम्) गुरु की आज्ञा का उलंघन करके (असत्कृतम्) अनादर करके (च) और (अदेशकाले) अनुचित समय स्थिति में (अपात्रोभ्यः) पूर्ण गुरु के बिना कुपात्र को (दीयते) दिया जाता है (तत्) वह दान (तामसम्) तामस (उदाहृतम्) कहा गया है। (22)

केवल हिन्दी अनुवाद: जो दान गुरु की आज्ञा का उलंघन करके अनादर करके और अनुचित समय स्थिति में पूर्ण गुरु के बिना कुपात्र को दिया जाता है वह दान तामस कहा गया है। (22)

विशेष:- निम्न श्लोक 23 से 28 तक पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति का विवरण कहा है तथा उसके लिए विशेष विवरण गीता अध्याय 8 श्लोक 5 से 10 व 12-13 अध्याय 4 श्लोक 34 व अध्याय 15 श्लोक1 से 4 व अध्याय 18 श्लोक 61, 62, 64, 66 में विस्तृत कहा है।