भगवान शिव
हिंदू परंपरा में भगवान शिव को सामान्यतः महादेव, महाकाल और अविनाशी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उन्हें संहारक, योगियों के आदिगुरु और त्रिदेवों में सर्वोच्च मानकर पूजा जाता है। लोक-मान्यता में शिव को जन्म–मरण से परे, स्वयंभू और सर्वशक्तिमान ईश्वर के रूप में देखा जाता है। किंतु जब शिव से संबंधित कथाओं को पुराणों के मूल पाठों—विशेषकर शिव पुराण, श्रीमद् भागवत पुराण और देवी भागवत पुराण—के आलोक में पढ़ा जाता है, तो उनका स्वरूप लोक-धारणा से भिन्न दिखाई देता है। इन ग्रंथों में वर्णित घटनाएँ शिव को एक महान देवता तो सिद्ध करती हैं, परंतु साथ ही यह भी दर्शाती हैं कि वे लीला, परीक्षा, संकट, सहायता और जन्म–मरण के नियमों से अछूते नहीं हैं। इसी शास्त्रीय दृष्टि से शिव के स्वरूप का विवेचन करना इस लेख का उद्देश्य है।
शिव पुराण की दारुवन (दारुक वन) कथा और श्रीमद् भागवत पुराण में वर्णित भस्मासुर प्रसंग—इन दोनों कथाओं से भगवान शिव का एक ऐसा स्वरूप सामने आता है जो लीलाधारी, परंतु सर्वथा स्वतंत्र और अविनाशी नहीं है। दारुवन की कथा में शिव अपने नग्न, विकराल रूप में प्रकट होते हैं और ऋषियों के शाप से उनका लिंग पृथ्वी पर गिर जाता है, जिससे त्रैलोक्य संकट में पड़ जाता है। उस संकट का समाधान भी शिव स्वयं नहीं करते, बल्कि ब्रह्मा के निर्देश पर पार्वती (योनि-आधार) द्वारा लिंग की स्थापना से शांति स्थापित होती है। इसी प्रकार भस्मासुर की कथा में, स्वयं शिव अपने दिए हुए वरदान से संकट में पड़ जाते हैं और विष्णु के हस्तक्षेप (मोहिनी रूप) के बिना उनका उद्धार संभव नहीं होता। ये दोनों कथाएँ यह संकेत देती हैं कि शिव अनेक स्थितियों में अन्य शक्तियों पर आश्रित दिखाई देते हैं, जो उन्हें सर्वशक्तिमान और पूर्णतः स्वतंत्र सिद्ध नहीं करतीं।
इसी क्रम में Devi Bhagwat Puran का स्पष्ट कथन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहाँ स्वयं शिव यह स्वीकार करते हैं कि उनका जन्म देवी दुर्गा (प्रकृति) से हुआ है और वे ब्रह्मा तथा विष्णु की भांति जन्म–मरण के चक्र में बंधे हैं। देवी भागवत में यह भी कहा गया है कि दुर्गा ही त्रिदेवों की जननी हैं और वे सनातनी प्रकृति हैं, जबकि ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाशवान हैं। अतः शास्त्रों के इन प्रमाणों के आधार पर शिव को जन्म से परे, अविनाशी परमात्मा कहना एक बाद की धार्मिक व्याख्या प्रतीत होती है। पुराणों में वर्णित घटनाएँ शिव को एक महान देव, योगी और लीला-कर्ता के रूप में तो स्थापित करती हैं, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट करती हैं कि वे प्रकृति के अधीन, जन्म–मरणशील और सीमित सत्ता हैं, न कि वह सर्वोच्च, शाश्वत और स्वतंत्र परम तत्व, जिसकी खोज मानव आत्मा मुक्ति के लिए करती है।