अध्याय 5 श्लोक 4
साङ्ख्ययोगौ, पृथक्, बालाः, प्रवदन्ति, न, पण्डिताः,
एकम्, अपि, आस्थितः, सम्यक्, उभयोः, विन्दते, फलम् ।।4।।
अनुवाद: (साङ्ख्ययोगौ) तत्वज्ञान के आधार से गृहस्थी व ब्रह्मचारी रहकर जो एक ही प्रकार की साधना करते हैं उन दोनों को (प्रथक्) प्रथक-2 फल प्राप्त होता है एैसा(बालाः) नादान (प्रवदन्ति) कहते हैं। वे (पण्डिताः) पण्डित (अपि) भी (न) नहीं हैं (एकम्) एक सर्व शक्तिमान परमेश्वर पर (सम्यक् आस्थितः) सम्यक् प्रकार से स्थित पुरुष (उभयोः) दोनों (फलम्)समान फलरूप को (विन्दते) तत्वज्ञान आधार से ही प्राप्त करते हैं गीता अध्याय 13 श्लोक 24-25 में विस्तृत वर्णन है। (4)
हिन्दी: तत्वज्ञान के आधार से गृहस्थी व ब्रह्मचारी रहकर जो एक ही प्रकार की साधना करते हैं उन दोनों को प्रथक.2 फल प्राप्त होता है एैसा नादान कहते हैं। वे पण्डित भी नहीं हैं एक सर्व शक्तिमान परमेश्वर पर सम्यक् प्रकार से स्थित पुरुष दोनों समान फलरूप को तत्वज्ञान आधार से ही प्राप्त करते हैं गीता अध्याय 13 श्लोक 24.25 में विस्तृत वर्णन है।
भावार्थ है कि जो अपनी अटकलों को लगा कर कोई कहते हैं कि शास्त्र विधि अनुसार साधना करने वाले जिन्होंने शादी नहीं करवाई है अर्थात् ब्रह्मचारी रहकर घर पर या आश्रम आदि में साधना करने वाले कर्म योगी श्रेष्ठ हैं। कोई कहते हैं कि शादी करवाकर बाल बच्चों में रहकर कर्म करते करते साधना करना श्रेष्ठ है, वे दोनों ही नादान हैं, क्योंकि वास्तविक ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान तो तत्वदर्शी संत ही सही भिन्न-भिन्न बताएगा कि शास्त्रविधि अनुसार साधना से दोनों को समान फल प्राप्त होता है। तत्वदर्शी सन्त का गीता अध्याय 4 मंत्र 34 में वर्णन है तथा तत्वदर्शी संत की पहचान गीता अध्याय 15 मंत्र 1 से 4ए में यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 10 व 13 में भी कहा है कि पूर्ण परमात्मा के विद्यान को तत्वदर्शी सन्त ही बताता है उस से सुनों।