अध्याय 4 श्लोक 18

कर्मणि, अकर्म, यः, पश्येत्, अकर्मणि, च, कर्म, यः,
सः, बुद्धिमान्, मनुष्येषु, सः, युक्तः, कृृत्स्न्नकर्मकृृत् ।।18।।

अनुवाद: (यः) जो मनुष्य (कर्मणि) कर्म अर्थात् शास्त्र अनुकूल साधना रूपी करने योग्य कर्म तथा (अकर्म) अकर्म अर्थात् शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण न करने योग्य कर्म को (पश्येत्) देखता है अर्थात् जान लेता है (च) और (यः) जो (अकर्मणि) अकर्म अर्थात् वह शास्त्र विरुद्ध साधना न करने योग्य कर्म को नहीं करता (कर्म) कर्म अर्थात् करने योग्य कर्म को करता है (सः) वह (मनुष्येषु) मनुष्योंमें (बुद्धिमान्) बुद्धिमान है और (सः) वह (युक्तः) योगी (कृत्स्न्नकर्मकृत्) समस्त शास्त्र विधि अनुसार ही कर्मोंको करनेवाला है। (18)

हिन्दी: जो मनुष्य कर्म अर्थात् शास्त्र अनुकूल साधना रूपी करने योग्य कर्म तथा अकर्म अर्थात् शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण न करने योग्य कर्म को देखता है अर्थात् जान लेता है और जो अकर्म अर्थात् वह शास्त्र विरुद्ध साधना न करने योग्य कर्म को नहीं करता कर्म अर्थात् करने योग्य कर्म को करता है वह मनुष्योंमें बुद्धिमान है और वह योगी समस्त शास्त्र विधि अनुसार ही कर्मोंको करनेवाला है।