अध्याय 5 श्लोक 17
तद्बुद्धयः, तदात्मानः, तन्निष्ठाः, तत्परायणाः,
गच्छन्ति, अपुनरावृत्तिम्, ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ।।17।।
अनुवाद: (तदात्मानः) वह तत्वज्ञान युक्त जीवात्मा (तद्बुद्धयः) उस पूर्ण परमात्मा के तत्व ज्ञान पर पूर्ण रूप से लगी बुद्धि से (तन्निष्ठाः) सर्वव्यापक परमात्मामें ही निरन्तर एकीभावसे स्थित है ऐसे (तत्परायणाः) उस परमात्मा पर आश्रित (ज्ञाननि र्धूतकल्मषाः) तत्वज्ञानके आधार पर शास्त्र विधि रहित साधना करना भी पाप है तथा उससे पुण्य के स्थान पर पाप ही लगता है इसलिए सत्य भक्ति करके पापरहित होकर (अपुनरावृत्त्सिम्) जन्म-मरण से मुक्त होकर संसार में पुनर् लौटकर न आने वाली गति अर्थात् पूर्ण मुक्ति को (गच्छन्ति) प्राप्त होते हैं। (17)
हिन्दी: वह तत्वज्ञान युक्त जीवात्मा उस पूर्ण परमात्मा के तत्व ज्ञान पर पूर्ण रूप से लगी बुद्धि से सर्वव्यापक परमात्मामें ही निरन्तर एकीभावसे स्थित है ऐसे उस परमात्मा पर आश्रित तत्वज्ञानके आधार पर शास्त्र विधि रहित साधना करना भी पाप है तथा उससे पुण्य के स्थान पर पाप ही लगता है इसलिए सत्य भक्ति करके पापरहित होकर जन्म-मरण से मुक्त होकर संसार में पुनर् लौटकर न आने वाली गति अर्थात् पूर्ण मुक्ति को प्राप्त होते हैं।