अध्याय 3 श्लोक 28
तत्त्ववित्, तु, महाबाहो, गुणकर्मविभागयोः,
गुणाः, गुणेषु, वर्तन्ते, इति, मत्वा, न, सज्जते ।।28।।
अनुवाद: (तु) परंतु (महाबाहो) हे महाबाहो! (गुणकर्मविभागयोः) गुणविभाग और कर्मविभागके (तत्त्ववित्) तत्वको जाननेवाला ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी (गुणाः) सम्पूर्ण गुण ही (गुणेषु) गुणोंमें (वर्तन्ते) बरत रहे हैं अर्थात् जितनी शक्ति तीनों गुणों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तमगुण शिव जी में है, उससे पूर्ण परिचित व्यक्ति की आस्था इन में इतनी रह जाती है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 45-46 में भी है (इति) ऐसा (मत्वा) समझकर उनमें (न,सज्जते) आसक्त नहीं होता अर्थात् अहंकार त्यागकर तुरन्त शास्त्रअनुकूल साधना करने लग जाता है। (28)
हिन्दी: परंतु हे महाबाहो! गुणविभाग और कर्मविभागके तत्वको जाननेवाला ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं अर्थात् जितनी शक्ति तीनों गुणों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तमगुण शिव जी में है, उससे पूर्ण परिचित व्यक्ति की आस्था इन में इतनी रह जाती है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 45-46 में भी है ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता अर्थात् अहंकार त्यागकर तुरन्त शास्त्रअनुकूल साधना करने लग जाता है।