अध्याय 2 श्लोक 48

योगस्थः, कुरु, कर्माणि, संगम्, त्यक्त्वा, धनञ्जय,
सिद्धयसिद्धयोः, समः, भूत्वा, समत्वम्, योगः, उच्यते ।।48।।

अनुवाद: (धनञ्जय) हे धनञ्जय! (संगम्) तू आसक्तिको (त्यक्त्वा) त्यागकर तथा (सिद्धयसिद्धयोः) सिद्धि और असिद्धिमें (समः) समान बुद्धिवाला (भूत्वा) होकर (योगस्थः) शास्त्रनुकूल भक्ति योगमें स्थित हुआ (कर्माणि) शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्तव्यकर्मोंको (कुरु) कर (समत्वम्) एक रूप ही (योगः) योग अर्थात् वास्तविक भक्ति (उच्यते) कहलाता है। (48)

हिन्दी: हे धनञ्जय! तू आसक्तिको त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धिमें समान बुद्धिवाला होकर शास्त्रनुकूल भक्ति योगमें स्थित हुआ शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्तव्यकर्मोंको कर एक रूप ही योग अर्थात् वास्तविक भक्ति कहलाता है।