अध्याय 3 श्लोक 25
सक्ताः, कर्मणि, अविद्वांसः, यथा, कुर्वन्ति, भारत,
कुर्यात्, विद्वान्, तथा, असक्तः, चिकीर्षुः, लोकसङ्ग्रहम् ।।25।।
अनुवाद: (भारत) हे भारत! (कर्मणि) कर्ममें (सक्ताः) आसक्त हुए (अविद्वांसः) अज्ञानीजन (यथा) जिस प्रकार शास्त्रअनुकूल कर्म (कुर्वन्ति) करते हैं (असक्तः) आसक्तिरहित (विद्वान्) विद्वान् भी (लोकसङ्ग्रहम्) शिष्य बनाने की इच्छा से जनता इक्कठी (चिकीर्षुः) करना चाहता हुआ (तथा) उपरोक्त शास्त्र विधि अनुसार कर्म (कुर्यात्) करे। (25)
हिन्दी: हे भारत! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार शास्त्रअनुकूल कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान् भी शिष्य बनाने की इच्छा से जनता इक्कठी करना चाहता हुआ उपरोक्त शास्त्र विधि अनुसार कर्म करे।
भावार्थ: भगवान कह रहे है कि यदि अशिक्षित व्यक्ति शास्त्रविधि अनुसार साधना करते हैं तो शिक्षित व्यक्ति को भी उसका अनुसरण करना चाहिए। इसी में विश्व कल्याण है।