अध्याय 13 श्लोक 10

मयि, च, अनन्ययोगेन, भक्तिः, अव्यभिचारिणी,
विविक्तदेशसेवित्वम्, अरतिः, जनसंसदि ।।10।।

अनुवाद: (मयि) मुझे (अनन्ययोगेन) अनन्य भक्ति के द्वारा (अव्यभिचारिणी) केवल एक इष्ट पर आधारित (भक्तिः) भक्ति (च) तथा (विविक्तदेशसेवित्वम्) एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और (जनसंसदि) विकारी मनुष्योंके समुदायमें (अरतिः) प्रेमका न होना। (10)

हिन्दी: मुझे अनन्य भक्ति के द्वारा केवल एक इष्ट पर आधारित भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और विकारी मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना।