अध्याय 9 श्लोक 8

प्रकृृतिम्, स्वाम्, अवष्टभ्य, विसृजामि, पुनः, पुनः।
भूतग्रामम्, इमम्, कृत्थ्म्, अवशम्,प्रकृतेः,वशात् ।।8।।

अनुवाद: (स्वाम्) अपनी (प्रकृतिम्) प्रकृति अर्थात् दुर्गा को (अवष्टभ्य) अंगीकार करके अर्थात् पति-पत्नी रूप में रखकर (प्रकृतेः) स्वभावके (वशात्) बलसे (अवशम्) परतन्त्र हुए (इमम्) इस (कृत्थ्म्) सम्पूर्ण (भूतग्रामम्) प्राणी समुदायको (पुनः,पुनः) बार-बार उनके कर्मोंके अनुसार (विसृजामि) रचता हूँ। (8)

हिन्दी: अपनी प्रकृति अर्थात् दुर्गा को अंगीकार करके अर्थात् पति-पत्नी रूप में रखकर स्वभावके बलसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणी समुदायको बार-बार उनके कर्मोंके अनुसार रचता हूँ।