यीशु: परमेश्वर के पुत्र या स्वयं परमेश्वर?
बाइबिल, पुराने नियम के प्रमाण और शास्त्र-सम्मत खंडन के साथ एक गहन अध्ययन
भूमिका
ईसाई धर्म में सामान्यतः यह विश्वास प्रचलित है कि यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर हैं और त्रिएक (Trinity) — पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा — का दूसरा स्वरूप हैं। परंतु यदि बाइबिल को बिना बाद की धार्मिक व्याख्याओं के, केवल उसके मूल पाठ और संदर्भ में पढ़ा जाए, तो एक भिन्न और स्पष्ट चित्र सामने आता है। बाइबिल निरंतर यह दर्शाती है कि यीशु परमेश्वर के पुत्र, परमेश्वर द्वारा भेजे गए दूत, और परमेश्वर से सामर्थ्य प्राप्त करने वाले सेवक हैं — न कि स्वयं परमेश्वर। यह लेख नए नियम, पुराने नियम के समानांतर प्रमाणों, तथा प्रचलित ईसाई दावों के शास्त्र-आधारित खंडन के माध्यम से इसी सत्य को स्पष्ट करता है।
1. बाइबिल की स्पष्ट गवाही: यीशु परमेश्वर के पुत्र हैं
नए नियम में कहीं भी यीशु को “परमेश्वर पुत्र” (God the Son) नहीं कहा गया, बल्कि बार-बार “परमेश्वर का पुत्र” कहा गया है।
स्वयं परमेश्वर की घोषणा
- “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ।” (मत्ती 3:17)
- “तू मेरा पुत्र है; आज मैं तेरा पिता हुआ।” (इब्रानियों 1:5)
- “यह मेरा पुत्र है, इसकी सुनो।” (मत्ती 17:5, मरकुस 9:7)
पिता और पुत्र की यह भाषा अपने आप में दो अलग अस्तित्वों को सिद्ध करती है। बाइबिल कहीं नहीं कहती कि पिता ही पुत्र है या पुत्र ही पिता है।
2. यीशु के अपने वचन: अधीनता और निर्भरता का प्रमाण
यीशु स्वयं कई स्थानों पर यह स्वीकार करते हैं कि वे परमेश्वर पर निर्भर हैं:
- “पिता मुझसे बड़ा है।” (यूहन्ना 14:28)
- “मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता।” (यूहन्ना 5:30)
- “मैं अपने पिता के काम करता हूँ।” (यूहन्ना 10:37)
- “मेरे पिता ने उन्हें मुझे दिया है।” (यूहन्ना 10:29)
यदि यीशु स्वयं परमेश्वर होते, तो उन्हें न तो शक्ति दी जाती और न ही वे किसी को अपने से “बड़ा” कहते। परमेश्वर स्वयं से शक्ति नहीं लेता।
3. “मैं और पिता एक हैं” — संदर्भ का सही अर्थ
अक्सर यूहन्ना 10:30 उद्धृत किया जाता है:
“मैं और पिता एक हैं।”
परंतु इसके आस-पास के पद स्पष्ट कर देते हैं कि यह एकता उद्देश्य और अधिकार की है, न कि अस्तित्व की।
- “जो काम मैं अपने पिता के नाम से करता हूँ…” (यूहन्ना 10:25)
- “जिसे पिता ने भेजा…” (यूहन्ना 10:36)
- “पिता मुझ में है और मैं पिता में।” (यूहन्ना 10:38)
यही भाषा यीशु अपने शिष्यों के लिए भी प्रयोग करते हैं:
- “वे सब एक हों, जैसे हम एक हैं।” (यूहन्ना 17:21)
यदि “एक” का अर्थ शाब्दिक रूप से एक ही अस्तित्व होता, तो शिष्य भी परमेश्वर बन जाते — जो बाइबिल कभी नहीं सिखाती।
4. पुराने नियम के प्रमाण: “परमेश्वर का पुत्र” का वास्तविक अर्थ
पुराने नियम में “परमेश्वर का पुत्र” एक पद या नियुक्ति को दर्शाता है, न कि ईश्वरत्व को।
इस्राएल को परमेश्वर का पुत्र कहा गया
- “इस्राएल मेरा पहिलौठा पुत्र है।” (निर्गमन 4:22)
राजाओं को पुत्र कहा गया
- “तू मेरा पुत्र है; आज मैं तेरा पिता हुआ।” (भजन संहिता 2:7)
यही पद बाद में यीशु पर लागू किया गया (इब्रानियों 1:5), जिससे सिद्ध होता है कि यह पद अधिकार और नियुक्ति का संकेत है।
स्वर्गदूत भी “परमेश्वर के पुत्र” कहलाए
- “परमेश्वर के पुत्र यहोवा के सामने उपस्थित हुए।” (अय्यूब 1:6)
अतः “परमेश्वर का पुत्र” एक हिब्रू अभिव्यक्ति है, जिसका अर्थ है — चुना हुआ सेवक।
5. यीशु परमेश्वर के दूत के रूप में
पुराने नियम की परंपरा स्पष्ट है:
- परमेश्वर दूत भेजता है
- उन्हें सामर्थ्य देता है
- उनके द्वारा बोलता है
यीशु इसी परंपरा में आते हैं:
- “अनंत जीवन यह है कि वे तुझे, एकमात्र सच्चे परमेश्वर को, और यीशु मसीह को, जिसे तूने भेजा है, जानें।” (यूहन्ना 17:3)
यहाँ यीशु स्वयं:
- पिता को एकमात्र सच्चा परमेश्वर कहते हैं
- स्वयं को भेजा हुआ बताते हैं
भेजने वाला और भेजा गया एक नहीं हो सकता।
6. ईसाई प्रत्युत्तर और उनका शास्त्र-सम्मत खंडन
प्रत्युत्तर 1: “यीशु की आराधना होती है, इसलिए वे परमेश्वर हैं”
खंडन: बाइबिल में सम्मान (proskuneo) राजाओं और भविष्यवक्ताओं को भी दिया गया है (1 इतिहास 29:20, दानिय्येल 2:46)। यीशु स्वयं कहते हैं:
- “अपने परमेश्वर यहोवा की उपासना कर और उसी की सेवा कर।” (मत्ती 4:10)
प्रत्युत्तर 2: “यीशु पाप क्षमा करते हैं, इसलिए वे परमेश्वर हैं”
खंडन: यीशु स्पष्ट कहते हैं कि यह अधिकार दिया गया है:
- “मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है।” (मत्ती 9:6)
दिया गया अधिकार उच्च अधिकारी की उपस्थिति सिद्ध करता है।
प्रत्युत्तर 3: “त्रिएक ईसाई विश्वास की नींव है”
खंडन: “Trinity” शब्द बाइबिल में कहीं नहीं है। यह सिद्धांत सदियों बाद परिषदों में विकसित हुआ। बाइबिल स्पष्ट रूप से अलग करती है:
- परमेश्वर (पिता)
- यीशु (पुत्र)
- परमेश्वर की आत्मा (शक्ति/उपस्थिति)
सिद्धांत शास्त्र से बनते हैं, शास्त्र सिद्धांत से नहीं।
निष्कर्ष
बाइबिल का स्पष्ट और निष्पक्ष अध्ययन यह दर्शाता है कि:
- परमेश्वर एक है, सर्वोच्च है
- यीशु परमेश्वर के पुत्र और दूत हैं
- यीशु को शक्ति और अधिकार परमेश्वर से मिला
- “एकता” का अर्थ उद्देश्य की एकता है, अस्तित्व की नहीं
- पुराने नियम से यह भाषा पहले से स्पष्ट है
अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि यीशु को स्वयं परमेश्वर मानना बाइबिल की मूल शिक्षा नहीं, बल्कि बाद की धार्मिक व्याख्या का परिणाम है। बाइबिल स्वयं गवाही देती है कि यीशु परमेश्वर के पुत्र और संदेशवाहक हैं, स्वयं परमेश्वर नहीं।