अध्याय 3 श्लोक 29

प्रकृतेः, गुणसम्मूढाः, सज्जन्ते, गुणकर्मसु,
तान्, अकृत्स्न्नविदः, मन्दान्, कृत्स्न्नवित्, न, विचालयेत् ।।29।।

अनुवाद: (प्रकृतेः) प्रकृति से उत्पन्न प्रकृति के पुत्र तीनों (गुणसम्मूढाः) गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी से अत्यन्त मोहित हुए मुर्ख मनुष्य (गुणकर्मसु) गुणों अर्थात् तीनों प्रभुओं की साधना के कर्मोंमें (सज्जन्ते) आसक्त रहते हैं (तान्) उन (अकृत्स्त्रविदः) पूर्णतया न समझनेवाले अर्थात् शास्त्र विधि त्याग कर साधना करने वाले जो स्वभाव वश चल रहे हैं उन (मन्दान्) मन्दबुद्धि अशिक्षितों को (कृत्स्त्रवित्) सत्यभक्ति जाननेवाला ज्ञानी अर्थात् शास्त्र अनुसार साधना करने वाले (न, विचालयेत्) मन्द बुद्धि अज्ञानियों को जो स्वभाववश तीनों गुणों अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी तक की साधना पर अडिग हैं, उनकी गलत साधना से विचलित नहीं कर सकते अर्थात् बहुत कठिन है, वे तो नष्ट ही हैं। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तक में भी है। (29)

हिन्दी: प्रकृति से उत्पन्न प्रकृति के पुत्र तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी से अत्यन्त मोहित हुए मुर्ख मनुष्य गुणों अर्थात् तीनों प्रभुओं की साधना के कर्मोंमें आसक्त रहते हैं उन पूर्णतया न समझनेवाले अर्थात् शास्त्र विधि त्याग कर साधना करने वाले जो स्वभाव वश चल रहे हैं उन मन्दबुद्धि अशिक्षितों को सत्यभक्ति जाननेवाला ज्ञानी अर्थात् शास्त्र अनुसार साधना करने वाले मन्द बुद्धि अज्ञानियों को जो स्वभाववश तीनों गुणों अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी तक की साधना पर अडिग हैं, उनकी गलत साधना से विचलित नहीं कर सकते अर्थात् बहुत कठिन है, वे तो नष्ट ही हैं। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तक में भी है।