पद्म पुराण में शिव द्वारा अंडकोष अर्पण की कथा

पद्म पुराण में शिव द्वारा अंडकोष अर्पण की कथा: एक आलोचनात्मक अध्ययन

(Padma Purana, Srishti Khanda, Adhyay 31)

पद्म पुराण के सृष्टि खंड के 31वें अध्याय में भगवान शिव से संबंधित एक अत्यंत असहज और विवादास्पद कथा मिलती है, जो उनके पुत्र कार्तिकेय के मुंडन या दीक्षा संस्कार के अवसर से जुड़ी है। यह प्रसंग सामान्य पुराणिक कथाओं से भिन्न है और शिव तत्व की सीमाओं, देहधर्म और उनकी मानवीय प्रवृत्तियों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

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दिव्य भोज का आयोजन

ग्रंथ के अनुसार, कार्तिकेय के संस्कार के उपलक्ष्य में भगवान शिव ने एक विशाल भोज का आयोजन किया, जिसमें ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता, गंधर्व, अप्सराएं, यक्ष, सिद्ध, ऋषि, ग्रह, नाग, डाकिनियां तथा समस्त देव-देवियां सम्मिलित हुए। आकाश पर्वतों से भर गया और सभी को उनकी इच्छा के अनुसार भोजन कराया गया।

भोजन के उपरांत मातृकाएं—विशेष रूप से शिवदूती—ने शिव से एक असाधारण मांग रखी। उन्होंने कहा कि वे ऐसा भोजन चाहती हैं जो न तो पहले कभी खाया गया हो और न ही जो स्वर्गलोक में सुलभ हो। साथ ही वह भोजन अत्यंत दुर्लभ, रसयुक्त और पूर्ण तृप्ति देने वाला होना चाहिए।

शिव का कथित “महादान”

इस मांग पर शिव ने कहा कि जो अमृत या अन्य दिव्य अन्न उन्होंने सिद्ध किया था, वह सब समाप्त हो चुका है। इसके बाद ग्रंथ में एक चौंकाने वाला कथन आता है। शिव स्वयं कहते हैं कि—

“मेरी नाभि के नीचे जो दो गोल-गोल फल के समान वृषण (अंडकोष) हैं, वही ऐसा पदार्थ है जिसे आज तक किसी ने नहीं खाया। उसी को मैं तुम्हें भोजन के रूप में देता हूँ।”

ग्रंथ में आगे वर्णन है कि मातृकाओं ने इसे शिव का “महान उपकार” मानकर प्रणाम किया और उस पदार्थ को ग्रहण किया, जिससे उन्हें अत्यधिक तृप्ति प्राप्त हुई।

देवी पार्वती और शिव का संवाद

इस पूरे प्रसंग में देवी पार्वती भी उपस्थित हैं। पाठ के अनुसार, उनके सामने ही शिव यह प्रस्ताव रखते हैं और कहते हैं कि उनके द्वारा सिद्ध किया गया अन्य कोई पदार्थ शेष नहीं है। शिव यह भी कहते हैं कि जो पदार्थ आज तक किसी ने नहीं खाया, वही वे प्रदान कर रहे हैं।

यह विवरण स्पष्ट करता है कि यह कोई रूपक या ज्योति-तत्व नहीं बताया गया है, बल्कि देह के गुप्त अंगों का प्रत्यक्ष उल्लेख है, जिसे भोजन के रूप में अर्पित किया गया।

दार्शनिक और नैतिक प्रश्न

यह कथा कई गंभीर प्रश्न उठाती है:

  1. क्या यह ईश्वर की मर्यादा के अनुरूप है? यदि शिव को पूर्ण, निर्विकार और देहातीत माना जाए, तो देह के अंगों का इस प्रकार उपयोग उस अवधारणा से मेल नहीं खाता।
  2. भक्ति और अश्लीलता की सीमा गुप्तांगों से संबंधित इस प्रकार का वर्णन और पूजन क्या आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है, या यह भक्ति के नाम पर मर्यादा का उल्लंघन?
  3. पुराणिक परंपरा में विरोधाभास एक ओर शिव को वैराग्य और तप का प्रतीक बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर ऐसे प्रसंग उन्हें भोग और देहधर्म से जुड़ा हुआ दर्शाते हैं।

निष्कर्ष

पद्म पुराण का यह प्रसंग यह स्पष्ट करता है कि शिव को सर्वथा अमर, निर्विकार और परम सत्ता मानने की धारणा स्वयं पुराणों के भीतर ही चुनौती पाती है। यह कथा शिव को एक सीमित, देहधारी और परिस्थितियों से बंधी सत्ता के रूप में प्रस्तुत करती है, जिन्हें अपनी ही स्थिति से उत्पन्न संकटों का समाधान करना पड़ता है।

ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या शिव को परमेश्वर कहना शास्त्रसम्मत है, या वे भी सृष्टि के उसी चक्र—जन्म, देह और क्षय—के अधीन हैं, जिसके अधीन अन्य देवता हैं।