अध्याय 3 श्लोक 8
नियतम्, कुरु, कर्म, त्वम्, कर्म, ज्यायः, हि, अकर्मणः,
शरीरयात्र, अपि, च, ते, न, प्रसिद्धयेत्, अकर्मणः ।।8।।
अनुवाद: (त्वम्) तू (नियतम्) शास्त्रविहित (कर्म) कर्म (कुरु) कर (हि) क्योंकि (अकर्मणः) कर्म न करनेकी अपेक्षा अर्थात् एक स्थान पर एकान्त स्थान पर विशेष कुश के आसन पर बैठ कर भक्ति कर्म हठपूर्वक करने की अपेक्षा (कर्म) संसारिक कर्म करते-करते भक्ति कर्म करना (ज्यायः) श्रेष्ठ है (च) तथा (अकर्मणः) कर्म न करनेसे अर्थात् हठयोग करके एकान्त स्थान पर बैठा रहेगा तो (ते) तेरा (शरीरयात्र) शरीर-निर्वाह अर्थात् तेरा परिवार पोषण (अपि) भी (न) नहीं (प्रसिद्धयेत्) सिद्ध होगा। (8)
हिन्दी: तू शास्त्रविहित कर्म कर क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा अर्थात् एक स्थान पर एकान्त स्थान पर विशेष कुश के आसन पर बैठ कर भक्ति कर्म हठपूर्वक करने की अपेक्षा संसारिक कर्म करते-करते भक्ति कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे अर्थात् हठयोग करके एकान्त स्थान पर बैठा रहेगा तो तेरा शरीर-निर्वाह अर्थात् तेरा परिवार पोषण भी नहीं सिद्ध होगा।