भगवद गीता

श्रीमद्भगवद गीता के अनुसार शास्त्रविधि युक्त भक्ति का वास्तविक अर्थ

विश्व में प्रचलित समस्त धर्मों और पंथों में सनातन धर्म सबसे अधिक प्राचीन माना जाता है। आदि शंकराचार्य के पश्चात् सनातन पंथ के अनुयायियों को हिन्दू कहा जाने लगा और कालांतर में यही सनातन पंथ “हिन्दू धर्म” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस धर्म की मूल आधारशिला पवित्र चार वेद—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—तथा उन्हीं का सार श्रीमद्भगवद गीता है।

वेद और श्रीमद्भगवद गीता को प्रभुदत्त (God Given) शास्त्र माना गया है, क्योंकि इनमें दिया गया ज्ञान स्वयं परमात्मा द्वारा प्रदत्त है। इसलिए इन शास्त्रों में वर्णित भक्ति विधि ही पूर्ण सत्य और पूर्ण कल्याणकारी है। प्रारंभिक काल में संपूर्ण मानव समाज केवल वेदों के आधार पर ही धर्म और कर्म का आचरण करता था। बाद में विभिन्न मत, पंथ, परंपराएँ और कर्मकांड प्रचलन में आए, जिनका आधार शास्त्र नहीं बल्कि लोकवेद (सुनी-सुनाई कथाएँ और मान्यताएँ) बना।

शास्त्रविधि अनुसार साधना का महत्व

श्रीमद्भगवद गीता स्पष्ट रूप से निर्देश देती है कि साधक को केवल वही भक्ति करनी चाहिए जो शास्त्रों में विधिवत बताई गई हो। जो साधना शास्त्रों में करने को नहीं कही गई, उसका आचरण करना “मनमाना आचरण” कहलाता है। गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में इसका स्पष्ट निर्णय दिया गया है कि—

  • जो साधक शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परम गति (पूर्ण मोक्ष) को और न ही वास्तविक सुख को।
  • इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय करने में शास्त्र ही प्रमाण हैं।

अर्थात् भक्ति में भावना नहीं, बल्कि शास्त्रविधि सर्वोपरि है।

गीता अध्याय 17 : श्रद्धा के तीन प्रकार

गीता अध्याय 17 में अर्जुन एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता है—जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त होकर देवताओं आदि का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति कैसी होती है? सात्विक, राजसी या तामसी?

इसके उत्तर में गीता ज्ञानदाता स्पष्ट करता है कि मनुष्य की श्रद्धा उसके पूर्व जन्मों के संस्कारों पर आधारित होती है। किसी की श्रद्धा सात्विक होती है, किसी की राजसी और किसी की तामसी। उसी के अनुसार उसकी उपासना का स्वरूप बनता है—

  • सात्विक व्यक्ति देवताओं की पूजा करते हैं
  • राजसी प्रवृत्ति वाले यक्षों और राक्षसों की ओर आकर्षित होते हैं
  • तामसी स्वभाव वाले प्रेत और भूतों की पूजा करते हैं

गीता यह भी स्पष्ट करती है कि जो लोग शास्त्रविधि से रहित होकर घोर तप करते हैं, शरीर को कष्ट देते हैं, अहंकार और दंभ से युक्त होते हैं, वे असुर स्वभाव वाले होते हैं। ऐसे लोग न केवल शरीर में स्थित शक्तियों को, बल्कि अंतःकरण में स्थित गीता ज्ञानदाता को भी कष्ट पहुँचाते हैं।

त्रिगुणमयी माया और देवताओं की पूजा

गीता अध्याय 7 श्लोक 12-15 तथा 20-23 में बताया गया है कि यह संपूर्ण संसार त्रिगुणमयी माया के अधीन है—

  • रजगुण से ब्रह्मा
  • सतगुण से विष्णु
  • तमगुण से शिव

जो साधक इन तीनों गुणों के अधीन देवताओं की पूजा करते हैं, उनका ज्ञान इन्हीं गुणों द्वारा हरण कर लिया जाता है। ऐसे लोग गीता ज्ञानदाता की भक्ति नहीं कर पाते और अन्य देवताओं की उपासना में ही सीमित रह जाते हैं। गीता ज्ञानदाता स्वयं कहता है कि—

  • जो जिस देवता की पूजा करता है, उसकी श्रद्धा मैं ही उस देवता में स्थिर करता हूँ
  • उस देवता को जो शक्ति प्राप्त है, वह भी मेरे द्वारा दी गई है
  • लेकिन उन देवताओं की पूजा से प्राप्त फल नाशवान है

देवताओं के उपासक देवताओं को ही प्राप्त होते हैं, जबकि मेरे भक्त मुझे प्राप्त होते हैं।

कर्मकांड, श्राद्ध और तीर्थ — गीता का निर्णय

लेख में यह भी स्पष्ट किया गया है कि श्राद्ध, पिंडदान, तेरहवीं, वर्षी, अस्थि विसर्जन, तीर्थ भ्रमण आदि कर्मकांड गीता में कहीं भी करने योग्य नहीं बताए गए हैं। इन्हें शास्त्रविधि रहित और अविद्या (मूर्ख साधना) कहा गया है। गीता अध्याय 9 श्लोक 25 में स्पष्ट निर्णय है कि—

  • देवताओं को पूजने वाले देवताओं को
  • पितरों को पूजने वाले पितरों को
  • भूतों को पूजने वाले भूत योनि को
  • और गीता ज्ञानदाता की पूजा करने वाले उसी को प्राप्त होते हैं

अतः कर्मकांड मोक्ष का साधन नहीं है।

पुराण बनाम वेद और गीता

लेख में पुराणों को वेद और गीता के समान प्रमाणिक नहीं माना गया है, क्योंकि पुराण ऋषियों के व्यक्तिगत अनुभव और लोकवेद पर आधारित हैं। अनेक ऋषियों के उदाहरण देकर यह स्पष्ट किया गया है कि घोर तप, सिद्धियाँ, श्राप-वरदान और कर्मकांड मानव को मोक्ष की ओर नहीं, बल्कि अहंकार और पतन की ओर ले जाते हैं। जो ज्ञान वेद और गीता से मेल नहीं खाता, उसे त्याग देना ही शास्त्रसम्मत है।


गीता ज्ञान देने वाले ने अपने से अन्य परमेश्वर की शरण में जाने को कहा है

वर्तमान समय में हिन्दू धर्म के अधिकांश गीता मनीषी, आचार्य और शंकराचार्य यह प्रचार करते हैं कि श्री विष्णु उर्फ श्री कृष्ण (जिन्हें वे गीता ज्ञानदाता मानते हैं) से अन्य कोई परमेश्वर है ही नहीं। जबकि श्रीमद्भगवद गीता का गहन अध्ययन करने पर यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि गीता ज्ञान देने वाले ने स्वयं अपने से भिन्न और उच्च परमेश्वर की शरण में जाने का आदेश दिया है।

गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता ज्ञानदाता अर्जुन से स्पष्ट कहता है कि—

“हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से तू परम शांति तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।”

यह श्लोक यह सिद्ध करता है कि गीता ज्ञानदाता स्वयं को सर्वोच्च नहीं मानता, बल्कि अपने से अन्य किसी परमेश्वर की शरण में जाने की प्रेरणा देता है। प्रश्न यह उठता है कि वह अन्य परमेश्वर कौन है?


गीता अध्याय 7 और 8 से परम अक्षर ब्रह्म का रहस्य

गीता अध्याय 7 श्लोक 29 में गीता ज्ञानदाता अर्जुन से कहता है कि जो साधक जरा (वृद्धावस्था), मरण (मृत्यु) से छुटकारा चाहते हैं और जो तत् ब्रह्म को जानते हैं, वही पूर्ण आध्यात्म को समझ पाते हैं।

अर्जुन इस कथन को समझ नहीं पाता और गीता अध्याय 8 श्लोक 1 में प्रश्न करता है कि यह तत् ब्रह्म क्या है?

इसके उत्तर में गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में गीता ज्ञानदाता स्पष्ट करता है कि—

“वह परम अक्षर ब्रह्म है।”

इसके पश्चात गीता अध्याय 8 श्लोक 5 और 7 में गीता ज्ञानदाता अपनी भक्ति करने को कहता है, किंतु इसी अध्याय के श्लोक 8, 9 और 10 में वह अपने से अन्य परम अक्षर ब्रह्म (सच्चिदानंद घन ब्रह्म) की भक्ति का वर्णन करता है।

यहाँ यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि—

  • जो मेरी भक्ति करता है, वह मुझे प्राप्त होता है
  • जो परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति करता है, वह उसी को प्राप्त होता है

अपनी भक्ति का मंत्र गीता ज्ञानदाता ने केवल एक अक्षर “ॐ” बताया है, जबकि परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति के लिए “ॐ तत् सत्” — तीन नाम बताए गए हैं।


गीता अध्याय 18 श्लोक 62 और सनातन परम धाम

गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता ज्ञानदाता स्पष्ट रूप से कहता है कि—

  • उस परमेश्वर की शरण में जाने से परम शांति प्राप्त होती है
  • उसी की कृपा से शाश्वतम् स्थानम् यानी सनातन परम धाम प्राप्त होता है

संत गरीबदास जी ने इसी सनातन परम धाम को सत्यलोक / अमरलोक कहा है। इससे सिद्ध होता है कि मोक्ष और सत्यलोक की प्राप्ति गीता ज्ञानदाता की भक्ति से नहीं, बल्कि उस परम अक्षर ब्रह्म की शरण में जाने से संभव है।


गीता ज्ञान को संत रामपाल जी महाराज ने स्पष्ट किया

यह संपूर्ण तत्वज्ञान, जो आज के अधिकांश धर्मगुरु, शंकराचार्य और गीता मनीषी नहीं समझ पाए, उसे संत रामपाल जी महाराज ने गीता शास्त्र के प्रमाणों सहित स्पष्ट किया है। उन्होंने गीता अध्याय 7, 8, 15 और 18 के श्लोकों को जोड़कर यह सिद्ध किया है कि—

  • गीता ज्ञानदाता स्वयं नाशवान है
  • वह जन्म-मरण के बंधन में है
  • वह अपने से अन्य, अविनाशी परमेश्वर की शरण में जाने का आदेश देता है

क्या गीता ज्ञानदाता अविनाशी है?

अनेक हिन्दू धर्मगुरु गीता ज्ञानदाता को अविनाशी बताते हैं, जबकि गीता स्वयं इसका खंडन करती है।

गीता अध्याय 4 श्लोक 5 में गीता ज्ञानदाता कहता है—

“हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं।”

गीता अध्याय 2 श्लोक 12 में कहा गया है—

“मैं, तू और ये सभी पहले भी थे और आगे भी जन्म लेंगे।”

जो जन्मता है और मरता है, वह अविनाशी नहीं हो सकता। नाशवान कभी परम समर्थ नहीं होता।


फिर अविनाशी परमेश्वर कौन है?

इसका उत्तर गीता स्वयं देती है—

गीता अध्याय 2 श्लोक 17

जिससे यह संपूर्ण संसार व्याप्त है, वही अविनाशी है।

गीता अध्याय 15 श्लोक 16–17

यहाँ गीता तीन प्रभुओं का वर्णन करती है—

  1. क्षर पुरुष (नाशवान)
  2. अक्षर पुरुष (नाशवान)
  3. उत्तम पुरुष (परमात्मा) — जो इन दोनों से भिन्न, अविनाशी और सबका धारण-पोषण करने वाला है

यही परमात्मा वास्तविक पुरुषोत्तम है।

गीता अध्याय 15 श्लोक 18 में गीता ज्ञानदाता स्वयं स्वीकार करता है कि वह लोकवेद (दंतकथा) के आधार पर पुरुषोत्तम प्रसिद्ध है।


शास्त्रविधि अनुसार कर्तव्य और अकर्तव्य

गीता अध्याय 16 श्लोक 23–24 में स्पष्ट कहा गया है कि—

  • शास्त्रविधि से रहित भक्ति व्यर्थ है
  • न उससे सुख मिलता है
  • न सिद्धि
  • न मोक्ष

भक्ति का उद्देश्य यही तीन हैं—

  1. जीवन में सुख
  2. कार्यों की सिद्धि
  3. पूर्ण मोक्ष

जो साधना शास्त्र में नहीं बताई गई, उससे ये तीनों प्राप्त नहीं हो सकते।


तत्वदर्शी संत की आवश्यकता

गीता अध्याय 4 श्लोक 32–34 में कहा गया है कि—

  • पूर्ण तत्वज्ञान स्वयं परमात्मा अपने मुख से वाणी में बताता है
  • उस ज्ञान को तत्वदर्शी संत से समझना चाहिए
  • ज्ञान यज्ञ, द्रव्य यज्ञ से श्रेष्ठ है

तत्वदर्शी संत ही यह बताता है कि—

  • कौन-सा भक्ति कर्म कर्तव्य है
  • कौन-सा अकर्तव्य

निष्कर्ष

श्रीमद्भगवद गीता का निष्कर्ष स्पष्ट है—

  • गीता ज्ञानदाता परमेश्वर नहीं है
  • वह स्वयं अपने से अन्य, अविनाशी परमात्मा की शरण में जाने को कहता है
  • वही परमात्मा सत्यलोक का दाता है
  • शास्त्रविधि अनुसार भक्ति ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है

अब समय है आँखें खोलकर गीता को स्वयं पढ़ने और समझने का। अंध-परंपराओं और लोकवेद आधारित साधनाओं से बाहर आकर तत्वज्ञान को अपनाने का।