अध्याय 4 श्लोक 38
न, हि, ज्ञानेन, सदृृशम्, पवित्रम्, इह, विद्यते,
तत् स्वयम्, योगसंसिद्धः, कालेन, आत्मनि, विन्दति।।38।।
अनुवाद: (इह) इस संसारमें (ज्ञानेन) तत्व ज्ञानके (सदृशम्) समान (पवित्रम्) पवित्र करनेवाला (हि) निःसन्देह कुछ भी (न) नहीं (विद्यते) जान पड़ता (योगसंसिद्धः) उस तत्वदर्शी संत के द्वारा दिए सत भक्ति मार्ग के द्वारा जिसकी भक्ति कमाई पूर्ण हो चुकी है (कालेन) समय अनुसार (तत् आत्मनि) आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले उस पूर्ण परमात्मा को गीता अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 में वर्णित उल्लेख के आधार से(स्वयम्) अपने आप ही (विन्दति) प्राप्त कर लेता है। (38)
हिन्दी: इस संसारमें तत्व ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह कुछ भी नहीं जान पड़ता उस तत्वदर्शी संत के द्वारा दिए सत भक्ति मार्ग के द्वारा जिसकी भक्ति कमाई पूर्ण हो चुकी है समय अनुसार आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले उस पूर्ण परमात्मा को गीता अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 में वर्णित उल्लेख के आधार से अपने आप ही प्राप्त कर लेता है।