अध्याय 9 श्लोक 15

ज्ञानयज्ञेन, च, अपि, अन्ये, यजन्तः, माम्, उपासते,
एकत्वेन, पृथक्त्वेन, बहुधा, विश्वतोमुखम् ।।15।।

अनुवाद: (अन्ये) दूसरे (माम्) मुझ ब्रह्मका (ज्ञानयज्ञेन) ज्ञानयज्ञके द्वारा (एकत्वेन) अभिन्न-भावसे (यजन्तः) पूजन करते हुए (अपि) भी (च) और दूसरे मनुष्य (बहुधा) बहुत प्रकारसे स्थित (विश्वतोमुखम्) मुझ विराट्स्वरूप परमेश्वरकी (पृथक्त्वेन) प्रथक्-भावसे (उपासते) उपासना करते हैं। (15)

हिन्दी: दूसरे मुझ ब्रह्मका ज्ञानयज्ञके द्वारा अभिन्न-भावसे पूजन करते हुए भी और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकारसे स्थित मुझ विराट्स्वरूप परमेश्वरकी प्रथक्-भावसे उपासना करते हैं।