अध्याय 3 श्लोक 35
श्रेयान्, स्वधर्मः, विगुणः, परधर्मात्, स्वनुष्ठितात्,
स्वधर्मे, निधनम्, श्रेयः, परधर्मः, भयावहः ।।35।।
अनुवाद: (विगुणः) गुणरहित अर्थात् शास्त्र विधि त्याग कर (स्वनुष्ठितात्) स्वयं मनमाना अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए (परधर्मात्) दूसरोंकी धार्मिक पूजासे (स्वधर्मः) अपनी शास्त्र विधि अनुसार पूजा (श्रेयान्) अति उत्तम है जो शास्त्रनुकूल है (स्वधर्मे) अपनी पूजा में तो (निधनम्) मरना भी (श्रेयः) कल्याणकारक है और (परधर्मः) दूसरेकी पूजा (भयावहः) भयको देनेवाली है। (35)
हिन्दी: गुणरहित अर्थात् शास्त्र विधि त्याग कर स्वयं मनमाना अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए दूसरोंकी धार्मिक पूजासे अपनी शास्त्र विधि अनुसार पूजा अति उत्तम है जो शास्त्रनुकूल है अपनी पूजा में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेकी पूजा भयको देनेवाली है।
यही प्रमाण श्री विष्णु पुराण तृतीश अंश, अध्याय 18 श्लोक 1 से 12 पृष्ठ 215 से 220 तक है।