अध्याय 2 श्लोक 39

एषा, ते, अभिहिता, साङ्ख्ये, बुद्धिः, योगे, तु, इमाम्, श्रृणु,
बुद्धया, युक्तः, यया, पार्थ, कर्मबन्धम्, प्रहास्यसि ।।39।।

अनुवाद: (पार्थ) हे पार्थ! (एषा) यह (बुद्धिः) ज्ञानवाणी (ते) तेरे लिये (साङ्ख्ये) ज्ञानयोगके विषयमें (अभिहिता) कही गयी (तु) और अब तू (इमाम्) इसको (योगे) योगके विषयमें (श्रृणु) सुन (यया) जिस (बुद्धया) बुद्धिसे (युक्तः) युक्त हुआ तू (कर्मबन्धम्) कर्मोंके बन्धनको (प्रहास्यसि) भलीभाँति त्याग देगा यानी सर्वथा नष्ट कर डालेगा। गीता अध्याय 6 श्लोक 46 में कहा है कि ज्ञान योगियों और कर्मयोगियों से तत्वदर्शी सन्त अर्थात् योगी श्रेष्ठ है। इसी गीता अध्याय 5 श्लोक 2 में शास्त्रविरूद्ध ज्ञान योगी अर्थात् सन्यासी तथा कर्मयोगी दोनों को ही अश्रेष्ठ कहा है। (39)

हिन्दी: हे पार्थ! यह ज्ञानवाणी तेरे लिये ज्ञानयोगके विषयमें कही गयी और अब तू इसको योगके विषयमें सुन जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मोंके बन्धनको भलीभाँति त्याग देगा यानी सर्वथा नष्ट कर डालेगा। गीता अध्याय 6 श्लोक 46 में कहा है कि ज्ञान योगियों और कर्मयोगियों से तत्वदर्शी सन्त अर्थात् योगी श्रेष्ठ है। इसी गीता अध्याय 5 श्लोक 2 में शास्त्रविरूद्ध ज्ञान योगी अर्थात् सन्यासी तथा कर्मयोगी दोनों को ही अश्रेष्ठ कहा है।