अध्याय 13 श्लोक 19

प्रकृतिम्, पुरुषम्, च, एव, विद्धि, अनादी, उभौ, अपि।
विकारान्, च, गुणान्, च, एव, विद्धि, प्रकृतिसम्भवान् ।।19।।

अनुवाद: (प्रकृतिम्) प्रकृति अर्थात् प्रथम माया जिसे पराशक्ति भी कहते हैं (च) और (पुरुषम्) पूर्ण परमात्मा (उभौ) इन दोनोंको (एव) ही तू (अनादी) अनादि (विद्धि) जान (च) और (विकारान्) राग-द्वेषादि विकारोंको (च) तथा (गुणान्) त्रिगुणात्मक तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा,सतगुण विष्णु तथा तम्गुण शिव जी को (अपि) भी (प्रकृतिसम्भवान् एव) प्रकृृतिसे ही उत्पन्न (विद्धि) जान। यही प्रमाण गीता अध्याय 14 श्लोक 5 में भी है कि तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव जी प्रकृृति से उत्पन्न हैं। (19)

हिन्दी: प्रकृति अर्थात् प्रथम माया जिसे पराशक्ति भी कहते हैं और पूर्ण परमात्मा इन दोनोंको ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा,सतगुण विष्णु तथा तम्गुण शिव जी को भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न जान। यही प्रमाण गीता अध्याय 14 श्लोक 5 में भी है कि तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव जी प्रकृृति से उत्पन्न हैं।