अध्याय 3 श्लोक 4

न, कर्मणाम्, अनारम्भात्, नैष्कम्र्यम्, पुरुषः, अश्नुते,
न, च, संन्यसनात्, एव, सिद्धिम्, समधिगच्छति ।।4।।

अनुवाद: (न) न तो (कर्मणाम्) कर्मोंका (अनारम्भात्) आरम्भ किये बिना (नैष्कम्र्यम्) शास्त्रों में वर्णित शास्त्र अनुकुल साधना जो संसारिक कर्म करते-करते करने से पूर्ण मुक्ति होती है वह गति अर्थात् (पुरूषः) परमात्मा (अश्नुते) प्राप्त होता है जैसे किसी ने एक एकड़ गेहूँ की फसल काटनी है तो वह काटना प्रारम्भ करने से ही कटेगी। फिर काटने वाला कर्म शेष नही रहेगा (च) और (एव) इसलिए (संन्यसनात्) कर्मोंके केवल त्यागमात्रसे एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन पर बैठ कर संसारिक कर्म त्यागकर हठ योग से (सिद्धिम्) सिद्धि (न समधिगच्छति) प्राप्त नहीं होती है। (4)

हिन्दी: न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना शास्त्रों में वर्णित शास्त्र अनुकुल साधना जो संसारिक कर्म करते-करते करने से पूर्ण मुक्ति होती है वह गति अर्थात् परमात्मा प्राप्त होता है जैसे किसी ने एक एकड़ गेहूँ की फसल काटनी है तो वह काटना प्रारम्भ करने से ही कटेगी। फिर काटने वाला कर्म शेष नही रहेगा और इसलिए कर्मोंके केवल त्यागमात्रसे एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन पर बैठ कर संसारिक कर्म त्यागकर हठ योग से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है।