अध्याय 10 श्लोक 10
तेषाम्, सततयुक्तानाम्, भजताम्, प्रीतिपूर्वकम्,
ददामि, बुद्धियोगम्, तम्, येन, माम्, उपयान्ति, ते ।।10।।
अनुवाद: (तेषाम्) उन (सततयुक्तानाम्) निरन्तर ज्ञान पर विचार विमर्श में लगे हुओं तथा (प्रीतिपूर्वकम्) प्रेमपूर्वक (भजताम्) भजनेवालों को (तम्) उसी सत्र का (बुद्धियोगम्) ज्ञान योग (ददामि) देता हूँ (येन) जिससे (ते) वे (माम्) मुझको (उपयान्ति) प्राप्त होते हैं। (10)
हिन्दी: उन निरन्तर ज्ञान पर विचार विमर्श में लगे हुओं तथा प्रेमपूर्वक भजनेवालों को उसी सत्र का ज्ञान योग देता हूँ जिससे वे मुझको प्राप्त होते हैं।