दारुवन कथा और शिवलिंग पूजा का वास्तविक आधार
शिवलिंग पूजा की उत्पत्ति: दारुवन की कथा का शास्त्रीय विवरण
शिव पुराण में शिवलिंग की उत्पत्ति: ज्योति-तत्व या लिंग–योनि संयोग?
(शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 12 के अनुसार)
भूमिका
हिंदू धर्म में शिवलिंग की पूजा अत्यंत व्यापक है, परंतु इसके आरंभ का कारण सामान्यतः प्रतीकात्मक या दार्शनिक रूप में बताया जाता है। किंतु Shiv Purana की KotiRudra Samhita, अध्याय 12 में शिवलिंग पूजा की उत्पत्ति की एक स्पष्ट, घटनात्मक और कथात्मक व्याख्या दी गई है, जो दारुवन (दारुक वन) की घटना से जुड़ी है।
यह कथा स्वयं यह प्रश्न उठाती है कि शिव ने लिंग-रूप क्यों धारण किया और शिवलिंग की स्थापना क्यों आवश्यक मानी गई।
ऋषियों का प्रश्न और सूतजी का उत्तर
ऋषियों ने सूतजी से प्रश्न किया कि—
- शिव का लिंग-रूप क्यों पूजा जाता है?
- पार्वती को बाण (योनि-आधार) रूप में क्यों बताया गया है?
सूतजी ने उत्तर दिया कि यह कथा एक भिन्न कल्प की है, जिसे उन्होंने व्यासजी से सुना था, और इसका संबंध दारुवन वन से है।
दारुवन के शिव-भक्त ऋषि
दारुवन में अनेक ब्राह्मण ऋषि निवास करते थे जो—
- दिन में तीन बार शिव की पूजा करते थे
- मंत्र, स्तुति और ध्यान में लीन रहते थे
- स्वयं को महान शिव-भक्त मानते थे
यद्यपि वे शिव-भक्त थे, परंतु उनका भक्ति-पथ बाह्य कर्मकांड और अहंकार से युक्त था।
शिव की परीक्षा-लीला
उन ऋषियों की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए शिव स्वयं एक विकराल, नग्न और भस्म-लेपित रूप में दारुवन में प्रकट हुए।
शिव—
- पूर्णतः नग्न थे
- शरीर पर केवल भस्म थी
- हाथ में अपना लिंग धारण कर अशोभनीय चेष्टाएँ कर रहे थे
यह रूप देखकर ऋषियों की पत्नियाँ भयभीत हो गईं, किंतु कुछ स्त्रियाँ कौतूहल और मोहवश उनके समीप चली गईं।
ऋषियों का क्रोध और शाप
जब ऋषि वहाँ पहुँचे और शिव को इस रूप में देखा, तो वे—
- क्रोधित हो उठे
- उन्हें एक पतित और वेद-विरोधी व्यक्ति समझ बैठे
- शिव की माया से भ्रमित होकर उन्हें पहचान नहीं पाए
उन्होंने कहा:
“तुम वेद-मार्ग का उल्लंघन कर रहे हो। इसलिए तुम्हारा लिंग पृथ्वी पर गिर जाए।”
लिंग का पतन और त्रैलोक्य में संकट
शाप के तुरंत बाद—
- शिव का लिंग पृथ्वी पर गिर गया
- वह जहाँ-जहाँ गया, वहाँ सब कुछ जलने लगा
- वह न स्थिर हुआ—न पृथ्वी पर, न पाताल में, न स्वर्ग में
पूरा त्रैलोक्य संकट में आ गया। देवता, ऋषि, मनुष्य—सब दुःखी हो गए।
ब्रह्मा की शरण
सभी देवता और ऋषि ब्रह्मा के पास पहुँचे। ब्रह्मा ने स्पष्ट कहा—
- यह सब शिव की माया से हुआ है
- शिव का अपमान करके कोई सुख नहीं पा सकता
उन्होंने यह भी कहा:
“जब तक शिव का लिंग स्थिर नहीं होगा, तब तक तीनों लोकों में कल्याण नहीं हो सकता।”
समाधान: पार्वती का योनि-रूप
ब्रह्मा ने उपाय बताया—
- देवी पार्वती को प्रसन्न किया जाए
- वे योनि-रूप (आधार) धारण करें
- उसी आधार में शिवलिंग की स्थापना की जाए
उन्होंने विधि भी बताई—
- अष्टदल कमल यंत्र
- कलश स्थापना
- सतरुद्रिया मंत्रों से अभिषेक
- वेद-विधि से पूजा
शिव का कथन
शिव ने स्वयं कहा:
“यदि मेरा लिंग योनि-आधार में स्थापित होगा, तभी शांति होगी। पार्वती के अतिरिक्त कोई अन्य स्त्री इसे धारण नहीं कर सकती।”
शिवलिंग की स्थापना और परिणाम
पार्वती और शिव की संयुक्त पूजा के बाद—
- शिवलिंग स्थिर हुआ
- तीनों लोकों में शांति और कल्याण हुआ
- वही लिंग आगे चलकर पूज्य हुआ
यह लिंग ‘हतेश’ और ‘शिविशिव’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कथा का निष्कर्ष (शास्त्र के अनुसार)
Shiv Purana के इस अध्याय के अनुसार:
- शिवलिंग पूजा का आरंभ एक संकट-निवारण उपाय के रूप में हुआ
- लिंग और योनि की स्थापना को त्रैलोक्य संतुलन से जोड़ा गया
- यह कथा शिव को एक लीलाधारी, पर परिस्थितिजन्य रूप से निर्भर देवता के रूप में प्रस्तुत करती है
यह विवरण दार्शनिक प्रतीक नहीं, बल्कि घटनात्मक पुराण-कथा के रूप में दिया गया है।
विचारात्मक विवेचन
दारुवन की कथा (Shiv Purana, KotiRudra Samhita, अध्याय 12) के अनुसार यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आता है कि शिवलिंग कोई निराकार ज्योति नहीं, बल्कि लिंग और योनि के प्रत्यक्ष संयोग का रूप है, जहाँ शिव का लिंग पृथ्वी पर गिरने के बाद पार्वती द्वारा योनि-आधार में स्थापित किया जाता है। स्वयं ब्रह्मा और शिव यह स्वीकार करते हैं कि जब तक यह लिंग योनि में स्थिर नहीं होगा, तब तक त्रैलोक्य में शांति संभव नहीं है। इससे यह सिद्ध होता है कि शिवलिंग की पूजा का आधार प्रजनन अंगों का प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि कथात्मक और भौतिक संयोग है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या गुप्तांगों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष स्वरूप की पूजा को आध्यात्मिक कहा जा सकता है। भारतीय परंपरा में जहाँ संयम, ब्रह्मचर्य और इंद्रिय-निग्रह को धर्म का मूल माना गया है, वहीं लिंग–योनि के संयोग को पूजा का केंद्र बनाना एक विरोधाभास उत्पन्न करता है। यह दृष्टिकोण आध्यात्मिक उन्नति से अधिक भौतिक सृजन-प्रक्रिया के महिमामंडन जैसा प्रतीत होता है, जिसे सामान्य नैतिक दृष्टि से अशोभनीय और प्रश्नास्पद कहा जा सकता है। अतः शिवलिंग पूजा को “ज्योति-तत्व” कहकर प्रस्तुत करना, स्वयं शिव पुराण की इस कथा के आलोक में, शास्त्रसम्मत नहीं प्रतीत होता, बल्कि यह बाद की व्याख्याओं द्वारा किया गया आध्यात्मिक आवरण जान पड़ता है।