अध्याय 6 श्लोक 23

तम्, विद्यात्, दुःखसंयोगवियोगम्, योगसज्ञितम्,
सः, निश्चयेन, योक्तव्यः, योगः, अनिर्विण्णचेतसा ।।23।।

अनुवाद: (तम्) अज्ञान अंधकार से अज्ञात पूर्ण परमात्मा के (योगसज्ञितम्) वास्तविक भक्ति ज्ञान को (विद्यात्) जानना चाहिए। (दुःख संयोग) जो पापकर्मों के संयोग से उत्पन्न दुःख का (वियोगम्) अन्त अर्थात् छूटकारा करता है (सः) वह (योगः) भक्ति (अनिर्विण्णचेतसा) न उकताये अर्थात् न मुर्झाए् हुए चितसे (निश्चयेन) निश्चयपूर्वक (योक्तव्यः) करना कत्र्तव्य है अर्थात् करनी चाहिए। (23)

हिन्दी: अज्ञान अंधकार से अज्ञात पूर्ण परमात्मा के वास्तविक भक्ति ज्ञान को जानना चाहिए। जो पापकर्मों के संयोग से उत्पन्न दुःख का अन्त अर्थात् छूटकारा करता है वह भक्ति न उकताये अर्थात् न मुर्झाए् हुए चितसे निश्चयपूर्वक करना कत्र्तव्य है अर्थात् करनी चाहिए।