अध्याय 6 श्लोक 41

प्राप्य, पुण्यकृताम्, लोकान्, उषित्वा, शाश्वतीः, समाः,
शुचीनाम्, श्रीमताम्, गेहे, योगभ्रष्टः, अभिजायते ।।41।।

अनुवाद: (योगभ्रष्टः) योगभ्रष्ट पुरुष (पुण्यकृृताम्) चैरासी लाख योनियों के कष्ट के बाद पुण्य कर्मों के आधार पर पुण्यवानोंके (लोकान्) लोकोंको अर्थात् स्वर्गादि लोकोंको (प्राप्य) प्राप्त होकर उनमें (शाश्वतीः) वेद वाणी के आधार से नियत (समाः) समय तक (उषित्वा) निवास करके फिर (शुचीनाम्) शुद्ध आचरणवाले (श्रीमताम्) अच्छे विचारों वाले अर्थात् श्रेष्ठ व्यक्तियों के (गेहे) घरमें (अभिजायते) जन्म लेता है, नीचे वाले श्लोक 43 में कहा है कि ऐसा जन्म दुर्लभ है। (41)

हिन्दी: योगभ्रष्ट पुरुष चैरासी लाख योनियों के कष्ट के बाद पुण्य कर्मों के आधार पर पुण्यवानोंके लोकोंको अर्थात् स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होकर उनमें वेद वाणी के आधार से नियत समय तक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले अच्छे विचारों वाले अर्थात् श्रेष्ठ व्यक्तियों के घरमें जन्म लेता है, नीचे वाले श्लोक 43 में कहा है कि ऐसा जन्म दुर्लभ है।