अध्याय 9 श्लोक 24

अहम्, हि, सर्वयज्ञानाम्, भोक्ता, च, प्रभुः,एव, च,
न, तु, माम्,अभिजानन्ति,तत्त्वेन,अतः,च्यवन्ति,ते ।।24।।

अनुवाद: (हि) क्योंकि (सर्वयज्ञानाम्) सम्पूर्ण यज्ञोंका (भोक्ता) भोक्ता (च) और (प्रभुः) स्वामी (च) भी (अहम्) मैं (एव) ही हूँ, (तु) परंतु (ते) वे (माम्) मुझे (तत्त्वेन) तत्त्वसे (न) नहीं (अभिजानन्ति) जानते (अतः) इसीसे (च्यवन्ति) गिरते हैं अर्थात् चैरासी लाख प्रकार के प्राणियों के शरीरों में कष्ट भोगते हैं। (24)

हिन्दी: क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे मुझे तत्त्वसे नहीं जानते इसीसे गिरते हैं अर्थात् चैरासी लाख प्रकार के प्राणियों के शरीरों में कष्ट भोगते हैं।