भविष्य पुराण की एक विवादास्पद कथा: अनुसूया और ब्रह्मा-विष्णु-शिव का आचरण
भविष्य पुराण की विवादास्पद कथा: जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने अनुसूया की मर्यादा को ललकारा
भविष्य पुराण में अनेक ऐसी कथाएँ मिलती हैं जो बाद के समय में प्रचलित देवताओं की आदर्श और सर्वथा पवित्र छवि से मेल नहीं खातीं। ऐसी ही एक अत्यंत संवेदनशील और विचारोत्तेजक कथा महर्षि अत्रि, उनकी पत्नी अनसूया, तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव से संबंधित है। यह प्रसंग न केवल नैतिक प्रश्न खड़े करता है, बल्कि देवताओं की कथित सर्वज्ञता, संयम और मर्यादा पर भी गंभीर विचार के लिए विवश करता है।

बृहस्पति जी बोले— एकबार भगवान् अत्रि ऋषि ने अपनी अनुसूया नामक पत्नी सहित गंगा के तट पर ब्रह्मध्यान में निमग्न होकर महान् तप करना आरम्भ किया।
उस समय ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव जी ने अपने-अपने वाहनों पर बैठकर वहाँ पहुँचने का प्रयत्न किया।
वहाँ पहुँचकर उन लोगों ने ऋषिमुनि अत्रि से दर्शन करने के लिए कहा। किन्तु अत्रि इन लोगों की बात पर कुछ ध्यान न देकर पूर्व की भाँति ब्रह्मध्यान में मग्न हो रहे।
उनके भाव को जानकर उन तीनों देवों ने उनकी पत्नी अनुसूया के पास जाकर उनसे कहना आरम्भ किया।
इस समय अनुसूया के वशीभूत होकर एक हाथ से लिया ग्रहण किया, विष्णु उससे रस बुद्धि कर रहे थे और ब्रह्मा अपनी कामवासना नष्ट करने पर तुले थे।
वे लोग उससे बार-बार यही कह रहे थे कि— “सुन्दर नेत्रों से कटाक्षपात करने वाली प्रिये! मुझे रति दान प्रदान करो, अन्यथा तुम्हारे सामने मेरा प्राण निकल रहा है।”
उस समय पतिव्रता अनुसूया ने उन लोगों की उस अशुभ वाणी को सुनकर भी उनके कौपथ्य से भयभीत होने के नाते उन लोगों से कुछ नहीं कहा।
किन्तु अत्यन्त संकोचित उन वरदान देवों ने जो माया विरुद्ध थे, बलात् उसे पकड़कर मैथुनार्थ प्रयत्न किया।
प्रसंग की पृष्ठभूमि: अत्रि का तप और अनुसूया का पतिव्रत
भविष्य पुराण के अनुसार महर्षि अत्रि अपनी पत्नी अनुसूया के साथ गंगा तट पर घोर तप में लीन रहते हैं। अनुसूया को अत्यंत पतिव्रता, शीलवती और धर्मनिष्ठ स्त्री के रूप में वर्णित किया गया है। उनका पतिव्रत इतना प्रभावशाली बताया गया है कि उसकी कीर्ति देव लोक तक पहुँच जाती है।
परंतु यह कीर्ति देवताओं के भीतर श्रद्धा नहीं, बल्कि कामजन्य आकर्षण को जन्म देती है।
त्रिदेवों का आगमन
ग्रंथ में वर्णन है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर अत्रि के आश्रम में पहुँचते हैं, उस समय जब अत्रि गहन ध्यान में लीन होते हैं। आश्रम में अकेली पाकर वे अनुसूया के पास जाते हैं।
यहाँ भविष्य पुराण का वर्णन अत्यंत स्पष्ट है—तीनों देव अनसूया से कामना पूर्ति की माँग करते हैं। यह कोई रूपक या संकेत मात्र नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से कामुक आग्रह और दबाव का चित्रण है।
वे बार-बार कहते हैं कि यदि अनुसूया ने उनकी इच्छा पूरी नहीं की, तो उनके प्राण निकल जाएँगे। इस प्रकार वे करुणा और भय का सहारा लेकर भावनात्मक दबाव बनाते हैं।
अनुसूया की स्थिति: भय के बीच संयम
अनसूया इस व्यवहार से भयभीत हो जाती हैं, परंतु वे न तो सहमति देती हैं और न ही किसी प्रकार का प्रलोभन स्वीकार करती हैं। ग्रंथ के अनुसार वे चुप रहती हैं, संयम बनाए रखती हैं और अपने धर्म से विचलित नहीं होतीं।
यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि इस कथा में अनुसूया किसी चमत्कार, छल या देवताओं को दंड देने के माध्यम से नहीं जीततीं, बल्कि सहनशीलता और नैतिक दृढ़ता के बल पर उस स्थिति से निकलती हैं। अंततः असफल होकर तीनों देव वहाँ से चले जाते हैं।
नैतिक और धार्मिक प्रश्न
इस कथा से कई असहज प्रश्न उत्पन्न होते हैं:
- देवताओं को कामवश और असंयमी दर्शाया गया है।
- एक अकेली स्त्री पर तीन शक्तिशाली पुरुषों का सामूहिक दबाव दिखाया गया है।
- यह व्यवहार न तो धर्मसम्मत है और न ही मर्यादित।
- इसे किसी “लीला” या “परीक्षा” के रूप में ग्रंथ स्वयं प्रस्तुत नहीं करता।
यदि ब्रह्मा, विष्णु और शिव को सर्वथा मुक्त, सर्वज्ञ और परम नैतिक सत्ता माना जाए, तो ऐसा आचरण उनसे असंभव होना चाहिए। यह कथा उन्हें देहधारी, इच्छा-ग्रस्त और नैतिक रूप से त्रुटिपूर्ण प्राणी के रूप में प्रस्तुत करती है।
बाद की कथाओं से अंतर
बाद के पुराणों और लोककथाओं में इस प्रसंग को प्रायः:
- “परीक्षा” कहकर प्रस्तुत किया गया,
- यौन संकेतों को हटा दिया गया,
- देवताओं के दोष को ढँक दिया गया,
- और अनुसूया के कष्ट को “महिमा” में बदल दिया गया।
परंतु भविष्य पुराण का मूल वर्णन ऐसी व्याख्याओं का समर्थन नहीं करता। यहाँ कथा देवताओं की आलोचना के रूप में सामने आती है, न कि उनके गुणगान के रूप में।
निष्कर्ष
भविष्य पुराण में अनुसूया और त्रिदेवों की यह कथा स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि सभी पूज्य माने जाने वाले देवता नैतिक रूप से सर्वोच्च नहीं हैं। इसके विपरीत, एक साधारण गृहस्थ स्त्री—अनसूया—अपने चरित्र और संयम से देवताओं से ऊँचा स्थान प्राप्त करती है।
यह प्रसंग पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि जो स्वयं काम, भय और दबाव से ग्रस्त हों, वे कैसे परम धर्म के स्रोत हो सकते हैं?
इस दृष्टि से भविष्य पुराण न केवल धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि देवताओं की सीमाओं को उजागर करने वाला एक गंभीर नैतिक दस्तावेज भी है।