गीता के महत्वपूर्ण श्लोक

पवित्र गीता जी का ज्ञान काल ने कहा है

अध्याय 11 श्लोक 32 में कहा है लोकों का नाश करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ। इस समय इन लोकोंको नष्ट करने के लिये प्रकट हुआ हूँ इसलिये जो प्रतिपक्षियोंकी सेनामें स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करनेसे भी इन सबका नाश हो जायेगा।

अध्याय 11 श्लोक 47 में पवित्र गीता जी को बोलने वाला प्रभु काल कह रहा है कि हे अर्जुन यह मेरा वास्तविक काल रूप है, जिसे तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा था।

गीता ज्ञान दाता नाशवान है, जन्म मृत्यु में है

गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5 तथा अध्याय 10 श्लोक 2 में गीता ज्ञान देने वाला भगवन कहा है कि मैं नाशवान हूँ। जन्म मृत्यु मेरी तथा तेरी सदा होती रहेगी।

अविनाशी परमात्मा गीता ज्ञान दाता से भिन्न है

गीता अध्याय 2 श्लोक 17 में कहा है कि नाशरहित तो तू उसको जान जिससे यह सम्पूर्ण जगत् दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।

गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में भी यही प्रमाण है की उत्तम पुरुष तो कोई अन्य ही है।

गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में भी यही प्रमाण है।

गीता ज्ञान दाता ब्रह्म का ईष्ट (पूज्य) देव पूर्णब्रह्म है

गीता ज्ञान दाता किसी और पूर्ण परमात्मा के विषय में बात करता है

गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि हे भारत! तू सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी ही शरणमें जा। उस परमात्माकी कृपा से ही तू परम शान्तिको तथा सदा रहने वाला सत स्थान/धाम/लोक को प्राप्त होगा।

गीता अध्याय 18 श्लोक 64 में कहा है कि एक सर्व गुप्त से गुप्त ज्ञान एक बार फिर सुन कि यही पूर्ण परमात्मा (जिसके विषय में अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है) मेरा पक्का पूज्य देव है अर्थात् मैं (ब्रह्म क्षर पुरुष) भी उसी की पूजा करता हूँ। यह तेरे हित में कहूँगा।

यही जानकारी गीता ज्ञान दाता प्रभु ने गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में भी दी है। जिसमें कहा है कि मैं उसी आदि पुरुष परमेश्वर की शरण में हूँ।

गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में गीता ज्ञान दाता अर्जुन को किसी और की शरण में जाने को कह रहा है।

इस श्लोक में व्रज का अर्थ गलत किया है। व्रज का अर्थ जाना होता है, सब ने आना किया है।

गीता अध्याय 8 श्लोक 8, 9, 10 में गीता ज्ञान दाता अपने से अन्य किसी और परमात्मा की बात कर रहा है।

गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में गीता ज्ञान दाता ने किसी अन्य को पूर्ण परमात्मा कहा है। कहा है उत्तम भगवान तो उपरोक्त दोनों प्रभुओं क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरुष से अन्य ही है जो तीनों लोकोंमें प्रवेश करके सबका धारण पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर परमात्मा इस प्रकार कहा गया है।

गीता ज्ञान दाता ब्रह्म (क्षर पुरुष) की साधना अनुत्तम (घटिया) है

गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में कहा है कि मेरी साधना अनुत्तम (घटिया) है।

अनुत्तम का अर्थ घटिया होता है। अनुवादकों ने अति उत्तम लिखा है जो की गलत है।

गीता देने वाले भगवन का मंत्र ॐ है

गीता ज्ञान दाता अध्याय 8, श्लोक 13 में कह रहा है कि मेरा एक ॐ मंत्र है।

पूर्ण परमात्मा का मंत्र ॐ तत सत है

गीता अध्याय 17, श्लोक 23 में बताया है कि उस परमात्मा कि भक्ति का मंत्र ॐ तत सत है।

गीता अनुसार व्रत रखना मन है

गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में व्रत रखना मना है। लिखा है, योग न तो बहुत खाने वाले, न बिलकुल न खाने वाले, न बहुत सोने वाले और न ही सदा जागने वाले के लिए सिद्ध होता है, ... अर्थात् व्रत रखना मना है।

तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की पूजा गीता में मना है

गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तथा 20 से 23 में तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की पूजा मना है।

  • गीता अध्याय 7 के श्लोक 15 में कहा है कि त्रिगुण माया (जो रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी की पूजा तक सीमित हैं तथा इन्हीं से प्राप्त क्षणिक सुख) के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है एैसे असुर स्वभाव को धारण किए हुए नीच व्यक्ति दुष्कर्म करने वाले मूर्ख मुझे नहीं भजते।

गीता में श्राद्ध करना निषेध है

गीता अध्याय 9 श्लोक 25 में श्राद्ध निकालना अर्थात् पितर पूजा, करना मना है। कहा है कि देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने (पिण्ड दान करने) वाले भूतों को प्राप्त होते हैं

शस्त्र विरुद्ध साधना मना है

गीता अध्याय 16, श्लोक 23, 24 में लिखा है की शस्त्र विरुद्ध साधना करने वाले को न सुख की प्राप्ति होती है, न सिद्धि, न गति होती है।

गीता में कहीं भी हरी ॐ, ॐ भगव्ते वसुदेव आए नमः, हरी ॐ तत सत, राम राम, हरे हरे, ॐ शांति, मंत्र का कोई ज़िक्र नहीं है। ये सब मनमुखी मंत्र हैं।

गीता अनुसार घोर तप करना गलत साधना है

गीता अध्याय 17 श्लोक 5, 6

  • श्लोक 17.5 - जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनमाना घोर तपको तपते हैं तथा पाखण्ड और अहंकारसे युक्त एवं कामना के आसक्ति और भक्ति बलके अभिमानसे भी युक्त हैं।
  • श्लोक 17.6 - जो शरीर में स्थित भूत समुदाय (पंच देव - ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा गणेश व दुर्गा) को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कष्ट देने वाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाव वाला जान।