अध्याय 6 श्लोक 3

आरुरुक्षोः, मुनेः, योगम्, कर्म, कारणम्, उच्यते,
योगारूढस्य, तस्य, एव, शमः, कारणम्, उच्यते ।।3।।

अनुवाद: (योगम्) योग अर्थात् भक्ति में (आरुरुक्षोः) आरूढ़ होनेकी इच्छावाले (मुनेः) मननशील साधकके लिये (कर्म) शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्म करना ही (कारणम्) हेतु अर्थात् भक्ति का उद्देश्य (उच्यते) कहा जाता है (तस्य) उस (योगारूढस्य) भक्ति में संलग्न साधकका (शमः) जो सर्वसंकल्पोंका अभाव है वही (एव) वास्तव में (कारणम्) भक्ति करने का कारण अर्थात् हेतु (उच्यते) कहा जाता है। (3)

हिन्दी: योग अर्थात् भक्ति में आरूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील साधकके लिये शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्म करना ही हेतु अर्थात् भक्ति का उद्देश्य कहा जाता है उस भक्ति में संलग्न साधकका जो सर्वसंकल्पोंका अभाव है वही वास्तव में भक्ति करने का कारण अर्थात् हेतु कहा जाता है।